'आंख के बदले आंख' का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता: अदालत

दिल्ली. दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक सभ्य समाज में दोषियों को सजा देने के लिए 'आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत' का सिद्धांत मानदंड नहीं हो सकता.  अदालत ने हत्या के दो मामलों में 16 साल से अधिक जेल की सजा काट चुके दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र को रिहा करते हुए यह टिप्पणी की.  दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र जितेंद्र को हत्या के एक मामले में एक निचली अदालत ने 30 साल की सजा सुनाई थी जबकि एक अन्य हत्या मामले में अदालत ने उसे जीवनभर जेल की सजा सुनाई थी.
      निचली अदालत ने स्पष्ट किया था कि जीवन पर्यन्त जेल की सजा दोषी (अब 42 साल) को मिली 30 साल की कैद पूरी होने के बाद शुरु होगी. अनुपात के सिद्धांत के संदर्भ में न्यायमूर्ति जीएस सिस्तानी और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की पीठ ने कहा कि इसका भारतीय अपराध विधिशास्त्र के तहत सजा सुनाने की नीति में बहुत प्रयोग होता है.
      अदालत ने कहा कि हमारा मानना है कि सभ्य समाज होने के नाते 'दांत के बदले दांत, आंख के बदले आंख' मानदंड नहीं होना चाहिए और आजीवन कारावास के संदर्भ में किसी तरह की जल्दबाजी में काम करने का सवाल नहीं उठता, बल्कि हमारा विधिशास्त्र बताता है कि हमारी अदालतें इस दिशा में पूरी तत्परता से काम नहीं करतीं और उस दृष्टि से यह जरुरी है कि अपराध की जघन्यता और सजा के बीच तार्किक अनुपात बनाया जाए. उच्च न्यायालय ने दोषी को कुल 16 साल और दस महीने की सजा सुनाते हुए ये टिप्पणियां कीं. यह समयावधि दोषी जेल में पहले ही काट चुका है इसलिए अदालत ने उसे रिहा करने का आदेश दिया.