China bowed to pressure from India

विस्तारवादी नीतियों पर चलने वाला चीन आखिर भारत के दबाव के सामने झुकने को मजबूर हुआ.

विस्तारवादी नीतियों पर चलने वाला चीन आखिर भारत के दबाव के सामने झुकने को मजबूर हुआ. उसके ध्यान में देर से ही सही, यह बात आ गई कि यह 1962 वाला कमजोर भारत नहीं है. इसकी सैन्य शक्ति, रणनीति तथा विश्वस्तरीय प्रभाव में हर प्रकार से उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. क्वाड देशों के समूह में भारत के साथ अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान हैं. पिछले दिनों अमेरिका के रक्षा एवं विदेश मंत्री भारत आए थे और उन्होंने चीन के खिलाफ भारत का साथ देने की बात कही थी. चीन समझ गया कि पाकिस्तान व टर्की छोड़कर कोई भी उसका साथी नहीं है. चीन का दबावतंत्र प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व वाले भारत पर नहीं चल पाया. अब यह बात सामने आई है कि भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में घुसपैठ व झड़प के समय से जारी गतिरोध जल्द ही खत्म हो सकता है. दोनों देशों के बीच उच्च सैन्य एवं डिप्लोमेटिक स्तर पर चर्चा के कई दौर हुए. अब दोनों देशों की सेनाओं के बीच यथास्थिति बरकरार रखने के लिए 3 चरणों में पीछे हटने की योजना पर सहमति बन गई है. दोनों ओर की सेनाएं अप्रैल-मई वाली अपनी पुरानी स्थिति में अपनी-अपनी पोजीशन पर लौट जाएंगी. गत 6 नवंबर को चुशूल में भारत व चीन की सेनाओं के कमांडर स्तर की बैठक हुई जिसमें यह फैसला हुआ.

3 चरणों में योजना लागू होगी

प्रथम चरण में दोनों देशों के टैंक, तोप व बख्तरबंद गाड़ियां एलएसी से एक खास दूरी तक वापस ले जाई जाएंगी. दूसरे चरण में पैंगांग झील के उत्तरी किनारे पर भारत व चीन की सेनाएं अपने पूर्व ठिकानों पर लौटेंगी. इसमें 3 दिनों तक प्रतिदिन अपनी-अपनी सैन्य टुकड़ियों को 30 फीसदी तक हटाया जाएगा. तृतीय व अंतिम चरण में दोनों ओर की सेनाएं चुशूल और रेजोंग ला क्षेत्र के आसपास के इलाकों समेत पैंगांग लेक क्षेत्र के दक्षिणी किनारे से अपनी वर्तमान स्थिति से वापस लौट जाएंगी.

एलएसी का लगातार उल्लंघन

चीन की सेना ने गत वर्ष 200 से अधिक बार वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया. गलवान घाटी में हिंसक झड़प में चीन के दोगुने सैनिक मारे गए और कुछ को गिरफ्तार भी किया गया. भारतीय सेना ने बहादुरी दिखाई और एलएसी के साथ चीन के निर्माण कार्य को ध्वस्त कर दिया. भारतीय सेना के जवानों ने अपने मनोबल से चीनी नेतृत्व को संदेश दे दिया कि वह भारत को हल्के में न ले. इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, सीडीएस जनरल बिपिन रावत तथा एयरफोर्स चीफ आरकेएस भदौरिया ने भी चीन को सख्त चेतावनी दी कि वह आक्रामक और विस्तारवादी रवैये से बाज आए. ताइवान के नए राष्ट्रपति के शपथ समारोह में बीजेपी के 2 सांसदों की वर्चुअल मौजूदगी, क्वाड में भारत की सहभागिता तथा एलएसी के पास भारत द्वारा बुनियादी ढांचे के निर्माण ने चीन को सतर्क कर दिया कि उसकी धौंस नहीं चल सकती. लेह को काराकोरम दर्रे से जोड़नेवाली सड़क इस वर्ष के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है जो चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन इलाके पर नजर रखने के लिए भारत को सक्षम बनाएगी.

राफेल आने से भी चीन सतर्क

भारत के पास फ्रांस से अति आधुनिक लड़ाकू विमान राफेल की 2 खेप आ चुकी हैं. भारत को रूस से एस-400 मिसाइल भेदी रक्षा कवच भी उपलब्ध हो रहा है. भारतीय नौसेना को भी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, फिलीपीन्स का सहयोग होने से चीन समुद्री हलचल नहीं बढ़ा सकता. नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव का भारत माकूल जवाब दे रहा है. श्रीलंका ने भी चीन की बजाय भारत से अपने पुराने संबंधों को तरजीह दी है. कोरोना आपदा के समय भारत को हिंसक संघर्ष में फंसाने और उसके इलाकों पर कब्जा करने की चीन की साजिश थी. यद्यपि चीन की सैन्यशक्ति भारत से कई गुना अधिक है लेकिन भारत का मनोबल फिर भी मजबूत है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रधानमंत्री मोदी से विभिन्न मंचों पर कम से कम 18 बार मिले हैं. उन्हें भी समझ में आ गया कि मोदी एक सबल नेता हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल है. इसलिए विलंब से ही सही, चीन के ध्यान में आ गया कि दोनों देशों का अपनी सेनाओं को पूर्व स्थिति में ले जाना ही हितकर है.