राजनीति का अपराधीकरण, अब सुप्रीम कोर्ट ही इलाज खोजे

    राजनीति का अपराधीकरण ऐसी गंभीर समस्य है जो लाइलाज होती चली जा रही है. प्राय: सभी पार्टियां जानबूझकर ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवारी देती हैं जिसमें चुनाव जीतने की क्षमता हो. उसका आपराधिक चरित्र दबंगियत, दहशत उसकी अयोग्यता नहीं बल्कि राजनीतिक योग्यता मानी जाती हैं. वह अपनी गुंडागर्दी के बल पर चुनकर आ जाता है इसलिए हर पार्टी उसे टिकट देने के लिए लालायित रहती है. क्या यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य नहीं है कि जिन दुर्जनों की जगह जेल में होनी चाहिए वे विधायक और सांसद तक बन जाते हैं? कुछ बाहुबली तो ऐसे भी हैं जो जेल में रहते हुए भी मजे से चुनाव जीत जाते हैं. चुनाव क्षेत्र की जनता जानती है कि उसे वोट नहीं दिया तो बाहर आने के बाद कोहराम मचा देगा. यही दहशत असामाजिक तत्वों को नेता बना देती है. यह लोकतंत्र के लिए कितना बड़ा कलंक है कि बिहार विधानसभा के चुनावों में 10 राजनीतिक दलों ने आपराधिक बैकग्राउंड के 469 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.

    सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में अपराधीकरण के मुद्दे पर तीव्र आक्रोश जताते हुए कहा कि अभी तक कुछ नहीं किया गया है और आगे भी कुछ नहीं होगा और हम भी अपने हाथ खड़े कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति आर एफ जरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने उन निर्देशों का पालन न होने को लेकर अप्रसन्नता जताई जिसमें उसने राजनीतिक पार्टियों को राजनीति को  अपराधीकरण से मुक्त कराने के लिए कहा था. शीर्ष अदालत ने  राजनीतिक दलों को अपनी वेबसाइटों और सोशल मीडिया, प्लेटफार्म पर अपने उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का विवरण, उन्हें टिकट देने का कारण बताने के साथ ऐसी पृष्ठ भूमि वालों को प्रत्याशी नहीं बनाने के निर्देश दिए थे. सुको ने कहा था कि राजदलों को अपने उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि को प्रत्याशी के चयन के 48 घंटे के भीतर या नामांकन दाखिल करने की तारीख से कम से कम 2 सप्ताह पहले प्रकाशित करना होगा.

    चुनाव आयोग की कमजोर दलील

    चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत के निर्देशों का पालन इसलिए नहीं किया जा सका क्योंकि राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों के नामों को बहुत देर से अंतिम रूप दिया और आखिरी दिनों में नामांकन दाखिल किया. इस पर एनसीपी की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से अनुरोध किया कि उसे इन बातों को ठीक करन के लिए विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करना चाहिए. सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लेख किया और इस बात पर खेद व्यक्त किया कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग और उसके निर्देशों का पालन नहीं कर रही हैं.

    7 जजों की पीठ को सौंपा जा सकता है मामला

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि वह दखल नहीं दे सकती. क्या ऐसा हस्तक्षेप विधायिका के क्षेत्र में प्रवेश के समान नहीं होगा. पीठ ने आगे कहा कि वह इस मामले को 7 जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपने के सुझाव पर विचार कर सकती है. अदालत को यह सुझाव दिया गया कि अपराधियों को उम्मीदवार बनाने वाली पार्टियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए. इसके अलावा नागरिकों को उनके चुनावी अधिकारों के बारे में जगरुक करने के उद्देश्य से चुनाव आयोग के लिए कोष बनाया जाए.