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हाल ही में जब खड़से ने शरद पवार से मुलाकात की थी, तभी संकेत मिल गया था कि वे एनसीपी में जाने वाले हैं.

यह अकस्मात लिया गया फैसला नहीं है. बीजेपी में लगातार उपेक्षित रहे और छले जा रहे पूर्व मंत्री और बीजेपी के असंतुष्ट दिग्गज नेता एकनाथ खड़से ने कई वर्षों तक धैर्य बनाए रखा लेकिन जब सब्र का बांध टूट गया तो उन्होंने विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस पर दोषारोपण करते हुए बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. वे एनसीपी में शामिल होंगे. हाल ही में जब खड़से ने शरद पवार से मुलाकात की थी, तभी संकेत मिल गया था कि वे एनसीपी में जाने वाले हैं. खड़से ने कहा कि उनके साथ बीजेपी का कोई विधायक या सांसद एनसीपी में शामिल नहीं होगा, वे किसी पद के लिए एनसीपी में शामिल नहीं हो रहे हैं. उद्धव ठाकरे सरकार में कृषिमंत्री बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस बारे में एनसीपी ही कोई जवाब दे सकती है. खड़से ने पिछले दिनों कहा भी था कि पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा, विदर्भ सभी क्षेत्रों के नेताओं को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला लेकिन उनके क्षेत्र उत्तर महाराष्ट्र से आज तक कोई सीएम नहीं बना.

खड़से ने देवेंद्र फडणवीस को निशाना बनाते हुए कहा कि मैं बीजेपी या पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ नहीं हूं. मैं केवल फडणवीस के कारण पार्टी छोड़ रहा हूं, जिसका मुझे दुख है. मैं पार्टी से आखिर तक पूछता रहा कि मेरा गुनाह क्या है? मेरा कसूर सिर्फ इतना ही है कि मैं लाचार नहीं हूं और किसी के तलुवे नहीं चाटता. मैंने बीजेपी में अपनी मेहनत से पद हासिल किया था. फडणवीस ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर मुझ पर कोई उपकार नहीं किया था. मुझ पर लगाए गए सभी आरोपों में कोई तथ्य सामने नहीं आए हैं. खड़से ने कहा कि जब सोशल वर्कर अंजलि दमानिया की शिकायत पर पुलिस मेरे खिलाफ मामला दर्ज नहीं कर रही थी तो तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुलिस को फोन करके मेरे खिलाफ विनयभंग का मामला दर्ज करने का आदेश दिया था, जिसमें मैं निर्दोष साबित हुआ लेकिन 4 वर्षों तक मुझे मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी.

जमीन खरीद मामले में पद छोड़ना पड़ा था

बीजेपी-शिवसेना की युति सरकार के समय पुणे में जमीन खरीदने के एक मामले में खड़से को कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इसके बाद से वे फडणवीस से नाराज थे. उन्होंने अपनी अप्रसन्नता सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी. विधान परिषद की 9 सीटों के लिए हुए चुनाव में बीजेपी द्वारा उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से वे और खफा हो गए थे.

ओबीसी वोटर छोड़ सकते हैं बीजेपी का साथ

खड़से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के बड़े नेता माने जाते हैं. उनके एनसीपी में जाने से ओबीसी वोटर भी बीजेपी का साथ छोड़ सकते हैं. खड़से के पहले भी महाराष्ट्र में अनेक नेता बीजेपी छोड़ने को बाध्य हुए थे. युति सरकार के दौरान ग्राम विकास मंत्री अण्णा डांगे ने बीजेपी छोड़कर लोकराज्य पार्टी बनाई और बाद में एनसीपी में शामिल हो गए थे. प्रतापसिंह गायकवाड ने गोपीनाथ मुंडे से मतभेद हो जाने के बाद एनसीपी की राह पकड़ ली थी. ओबीसी नेता विनोद गुडधे पाटिल ने 1995 में विधानसभा चुनाव जीते थे. अगले चुनाव में जब उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली तो वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे. महाराष्ट्र बीजेपी के संस्थापकों में से एक सूर्यभान वहाडने ने भी नाराज होकर पार्टी छोड़ दी थी. 

इसका क्या असर पड़ेगा

खड़से के पार्टी छोड़ने से बीजेपी पर क्या असर होगा, इसे लेकर चर्चा होनी स्वाभाविक है. जलगांव जिले में गत 5 वर्षों से पार्टी ने खड़से की बजाय गिरीश महाजन को जिम्मेदारी दे रखी है. महाजन के नेतृत्व में वहां से 2 सांसद, 4 विधायक, विधानपरिषद सदस्य निर्वाचित होने के अलावा जिला परिषद, जलगांव महानगरपालिका सहित 6 नगरपालिकाओं में सत्ता हासिल हुई है. अब खड़से के साथ आ जाने से एनसीपी की जलगांव में ताकत बढ़ सकती है. अजीत पवार तो विधानसभा चुनाव में भी खड़से को टिकट देने के इच्छुक थे. उन्होंने अंत तक खड़से की राह देखी थी. इस दौरान कांग्रेस व शिवसेना भी खड़से को अपने साथ आने का ऑफर दे रही थीं.

कोरे आश्वासनों से बहलाया जाता रहा

खड़से को विधानपरिषद सदस्य, राज्यसभा सदस्य व राज्यपाल पद जैसे अनेक आश्वासन दिए जाते रहे, जो पूरी तरह हवाई निकले. इनके विपरीत बीजेपी ने देवेंद्र फडणवीस को सीएम पद दिया. जब दूसरी बार सरकार बनाने में विफलता मिली तो नेता विपक्ष बनाया गया और बिहार विधानसभा के लिए पार्टी ने प्रभारी भी बना दिया. इसके विपरीत खड़से जैसे वरिष्ठ नेता की निरंतर उपेक्षा की जाती रही.