The agitation of farmers will continue even amid rising corona virus in the country, the farmer leaders said - Demonstration will not stop
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  • सिर्फ गिने-चुने रह गए हैं प्रदर्शन स्थलों पर

जनवरी-फरवरी में सुर्खियों में रहा किसान आंदोलन (Farmers Protest) अब पहले के समान चर्चा में नहीं है. हर आंदोलन की एक आयु होती है. उसमें कुछ समय तक उबाल आता है और फिर वह ठंडा होने लगता है. केंद्र सरकार भी जानती थी कि यदि किसान आंदोलन हठपूर्वक बहुत लंबा खींचा गया तो उसका यही हश्र होगा. इसलिए किसान नेताओं से बार-बार चर्चा के बाद उसने भी खामोशी अख्तियार कर ली. इसी दौरान कोरोना की दूसरी लहर और 5 राज्यों के चुनाव आ गए. ऐसे में किसान आंदोलन खबरों में अपनी प्राथमिकता खो बैठा. इस दौरान सरकार ने भी डेढ़ वर्ष तक कृषि कानून स्थगित रखने जैसा प्रस्ताव रखा तथा बार-बार आश्वासन दिया कि एमएसपी समाप्त नहीं किया जाएगा लेकिन किसान नेता टस से मस नहीं हुए. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा नियुक्त कृषि विशेषज्ञों की समिति ने भी 3 कृषि कानूनों में से एक वापस ले लेने की सिफारिश की है, जिस पर किसान नेताओं ने प्रतिक्रिया नहीं दी. वे तीनों कानूनों की बिना शर्त वापसी की मांग पर अड़े हुए हैं और उनका कहना है कि हमने किसी समिति की मांग नहीं की थी.

किसान कामधाम से लगे

गेहूं की फसल पककर तैयार है, कई जगह कटाई शुरू हो गई है. मंडियों में गेहूं खरीदा भी जाने लगा है. ऐसी हालत में सिंघु बार्डर पर धरना देने वाले किसान लौटकर पंजाब जाने लगे हैं. इस तरह प्रदर्शनकारियों की तादाद में गिरावट शुरू हो गई है. सिंघु बार्डर पर जो गिने-चुने लोग रह गए हैं, वे नेताओं के नजदीकी हैं और चाहकर भी घर नहीं लौट पा रहे हैं. वे ट्रालियों व टेंट में समय बिता रहे हैं.

टिकैत की अकड़ कायम

ऐसे समय जबकि कोरोना के कारण हर तरफ संक्रमण का खतरा बढ़ गया है, दिल्ली की सीमा पर बैठे किसान भी इससे प्रभावित हो सकते हैं, इतने पर भी किसान नेता आंदोलन खत्म न करने की बात दोहरा रहे हैं. भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि इसको शाहीन बाग मत बनने दो. पूरे देश में लॉकडाउन (Lock down) लग जाए लेकिन ये आंदोलन खत्म नहीं होगा. किसानों के दिमाग में उनके नेताओं ने यह बात भर दी है कि सरकार उन्हें अंबानी-अदानी जैसे पूंजीपतियों के भरोसे छोड़ने वाली है तथा उनकी खेती पर कारपोरेट का कब्जा हो जाएगा. विपक्षी पार्टियां भी किसानों की आशंका को बल दे रही हैं. किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) मूल्य आश्वासन व कृषि सेवा समझौता अधिनियम 2020 के तहत कृषि उत्पादन के लिए निजी कंपनियों या व्यक्तियों द्वारा किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग के समझौते की व्यवस्था की गई है. सरकार नई व्यवस्था में किसानों को बिचौलियों से मुक्ति दिलाना चाहती है. सरकार का तर्क है कि खुले बाजार में बेचते समय किसान को मंडी शुल्क व दलालों को कमीशन नहीं देना पड़ेगा और उपज का अधिक मूल्य मिलेगा. वे देश में कहीं भी अपनी उपज बेच सकेंगे.

किसानों की आशंका

किसानों के आंदोलन को व्यापारियों व आड़तियों का समर्थन है. समय-समय पर किसान उनसे पैसा लेते रहते हैं. उधर सरकार के गोदाम भी अनाज से लबालब भरे हैं. वह एमएसपी पर खरीद का लिखित कानून बनाना नहीं चाहती. पंजाब व हरियाणा में हरित क्रांति व सिंचाई सुविधा बढ़ जाने से बहुत अधिक गेहूं की पैदावार होने लगी है. इसीलिए वह खेती में कारपोरेट की भूमिका चाहती है जो सीधे किसानों से खरीदी करें. कार्पोरेट शुरू में अच्छा दाम देने के बाद किसानों को अपनी शर्तों पर झुका भी सकते हैं.