मोदी बराबर ठाकरे ब्रांड शिवसेना की ऊंची उड़ान

    शिवसेना ऊंची उड़ान भरना चाहती है तभी ‘मोदी बराबर ठाकरे’ ब्रांड की बात की जा रही है. दिल बहलाने के लिए स्वप्न देखना अच्छी बात है परंतु क्या हकीकत को झुठलाया जा सकता है? इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि शिवसेना राष्ट्रीय नहीं बल्कि क्षेत्रीय पार्टी है जिसका असली प्रभाव महाराष्ट्र में ही है. दूसरी ओर बीजेपी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है जिसकी देश के अधिकांश राज्यों में सरकार है. इसके बाद कांग्रेस का स्थान है और बाद में क्षेत्रीय पार्टियों का नंबर आता है. यह सही है कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने राज्यों में प्रभावशाली हैं और उनके सामने राष्ट्रीय दलों की दाल नहीं गलती. मिसाल के तौर पर बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी, ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजद, तमिलनाडु में स्टालिन की डीएमके तथा महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी!

    शिवसेना के 55वें स्थापना दिवस पर शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दे पर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की तैयारी दर्शाई. यह बात सभी समझते हैं कि बीजेपी और आरएसएस के नरम हिंदुत्व की तुलना में शिवसेना का हिंदुत्व अधिक उग्र, प्रखर व आक्रामक है. शिवसेना नेता खुली बात करने में विश्वास रखते हैं. जब बाबरी ढांचा टूटा था तब शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कहा था कि यदि मेरे किसी शिवसैनिक ने ऐसा किया है तो मुझे उस पर गर्व है. शिवसेना का तर्क है कि राष्ट्रीय राजनीति उसके लिए नई चीज नहीं है. शिवसेना नेता मनोहर जोशी लोकसभा अध्यक्ष रह चुके हैं. पार्टी लोकसभा चुनाव के अलावा अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव लड़ती रही है तथा एनडीए की सरकारों में शिवसेना के सांसद मंत्री रहे हैं.

    संजय राऊत ने तुलना की

    शिवसेना नेता व सांसद संजय राऊत ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी बड़े नेता हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि उनके बाद कोई नहीं है. लोग मान चुके है कि ‘ठाकरे’ शब्द अब राष्ट्रीय ब्रांड बन चुका है. राऊत के इस बयान से राष्ट्रीय स्तर पर कितने लोग सहमत होंगे? मोदी का कद अनायास ही नहीं बढ़ा. वे दीर्घकाल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और इस समय प्रधानमंत्री के रूप में उनका दूसरा टर्म चल रहा है. आरएसएस की संगठनात्मक ताकत उनके पीछे रही और बीजेपी के अन्य केंद्रीय नेताओं को पीछे छोड़कर मोदी आगे आए. उनके आत्मविश्वास व वक्तृत्व शक्ति ने उन्हें आगे बढ़ाया. मोदी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा नाम हो गया था, लेकिन कोरोना महामारी, महंगाई और बेरोजगारी जैसी बढ़ती चुनौतियों व घटती जीडीपी ने उनकी लोकप्रियता को आघात पहुंचाया. फिर भी अभी लोकसभा चुनाव के लिए 3 वर्ष का समय बाकी है और इस दौरान मोदी का सितारा फिर चमक सकता है.

    क्षेत्रीय पार्टियां चुनौती दे सकती हैं

    शिवसेना, एनसीपी, टीएमसी, डीएमके, बीजद, सपा, बसपा, राजद, जदयू, जदसे आदि का अपना-अपना प्रभाव क्षेत्र है. यदि क्षेत्रीय पार्टियां अपना तीसरा मोर्चा बना पाने में कामयाब हो पाईं तो अगले आम चुनाव में बीजेपी को बड़ी चुनौती दे सकती हैं लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? हर क्षेत्रीय नेता की अपनी महत्वाकांक्षा है इसलिए किसी एक सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता का चुनाव कर पाना उनके लिए आसान नहीं होगा.

    सेना-बीजेपी युति संभव नहीं

    उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट कर दिया कि शिवसेना और बीजेपी की युति संभव नहीं है. प्रादेशिक अस्मिता को बंगाल ने दिखा दिया है और अब महाराष्ट्र भी अपना दम दिखा रहा है. आत्मनिर्भर होने से हमें कोई रोक नहीं सकता. शिवसेना की स्थापना दूसरों की पालकी ढोने के लिए नहीं हुई. वह स्वाभिमान के साथ अपने बल पर बढ़ रही है. शिवसेना का आत्मविश्वास अपनी जगह है लेकिन किसी भी क्षेत्रीय दल की अपनी सीमाएं होती हैं. राष्ट्रीय स्तर हासिल कर केंद्र में सत्ता काबिज करना कदापि आसान नहीं है.