Government adamant not back the farmers law

इस वजह से सरकार और किसान नेताओं के बीच छठे चरण की प्रस्तावित बैठक टल गई.

13 दिनों से चल रहे किसानों के व्यापक आंदोलन और विपक्ष की तमाम पार्टियों द्वारा इस आंदोलन को समर्थन दिए जाने के बावजूद केंद्र सरकार इन 3 किसान कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और 13 किसान नेताओं की बातचीत बेनतीजा रही और सरकार ने इन कानूनों को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया.

इस वजह से सरकार और किसान नेताओं के बीच छठे चरण की प्रस्तावित बैठक टल गई. दोनों पक्ष अपने रुख पर अड़े हैं. सरकार कानूनों में संशोधन के लिए तैयार है लेकिन वापस हरगिज नहीं लेगी. विपक्ष की मांग है कि देश भर के किसान इन तीनों कानूनों के विरोध में हैं, इसलिए राष्ट्रपति देशहित में इन कानूनों को तुरंत निरस्त कर दें.

यह मांग अपनी जगह है लेकिन संसद के दोनों सदनों में पारित विधेयकों, जिन्हें राष्ट्रपति पहले ही हस्ताक्षर कर कानून का रूप दे चुके हैं, कैसे रद्द करेंगे? यह कदापि संभव नहीं है. यह बात तो शरद पवार और राहुल गांधी सहित सारे विपक्षी नेता भी समझते हैं. यदि बात किसी अध्यादेश (आर्डिनेंस) की होती तो उसे वापस भी लिया जा सकता था. 2015 में सरकार ने विपक्ष का विरोध देखते हुए एक अध्यादेश वापस लिया था.

विपक्ष संशोधन के लिए राजी नहीं

अ. भा. किसान महासभा के महासचिव और माकपा नेता हनन मुल्ला ने कहा कि गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार किसान कानूनों को वापस नहीं लेगी. सरकार लिखित रूप में देगी कि वह कौन से संशोधन कर सकती है. किसान कोई संशोधन नहीं चाहते. उनकी मांग है कि कानून रद्द किए जाएं. पुन: मीटिंग का कोई सवाल ही नहीं उठता. किसान नेता सरकार से कानून वापसी के बारे में सिर्फ हां या ना सुनना चाहते हैं.

पिछली बैठक में कृषि मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर ने कृषि कानूनों में कुछ संशोधन करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर लिखित आश्वासन देने की बात कही थी लेकिन किसान नेताओं ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया. वे एमएसपी की कानूनी गारंटी के अलावा विद्युत (संशोधन) विधेयक की वापसी चाहते हैं.

किसानों की कुछ चिंताएं शासकीय आदेशों से दूर हो सकती हैं लेकिन अन्य के लिए कानून में संशोधन की जरूरत पड़ेगी. उदाहरण के तौर पर एपीएमसी मंडियों और प्राइवेट मार्केटों के बीच साम्यता (लेवल प्लेइंग फील्ड) के लिए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य कानून में संशोधन करना पड़ेगा.

सरकार ने जल्दबाजी की

मोदी सरकार ने कृषि कानूनों को विपक्ष से चर्चा या बहस के बगैर तथा चयन समिति के पास भेजे बिना आपाधापी में ध्वनिमत से पारित करा लिया. वह इस बारे में किसानों को आश्वस्त नहीं करा पाई कि यह कानून उनकी भलाई के लिए हैं. इसीलिए किसानों के मन में संदेह पैदा हो गया कि एमएसपी और एपीएमसी मंडियां खत्म कर दिए जाएंगे. किसानों के आंदोलन में राजनीतिक दलों का कूद पड़ना और लामबंद होना उनका राजनीतिक स्वार्थ दिखाता है.

सभी सरकारें सुधार के पक्ष में थीं

सरकार के मुताबिक उसके कानून किसानों को एपीएमसी के चंगुल से आजाद करने वाले हैं और किसान अपनी उपज को सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को सीधे बेच सकते हैं. यह बात भी गौर करने लायक है कि अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के समय से सभी केंद्र सरकारें, अर्थशास्त्री व नीति निर्धारक कृषि कानूनों में सुधार के पक्ष में रहे हैं. अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में यूपीए सरकार मुख्यमंत्रियों से आदर्श (मॉडल) कृषि कानून बनाने के बारे में चर्चा करती रही है.

मोदी सरकार ने संविधान की समवर्ती सूची में मिले अधिकारों के तहत यह सुधार लागू किए. कांग्रेस ने भी अपने 2019 के चुनाव घोषणापत्र में कहा था कि वह एपीएमसी कानून रद्द करने के पक्ष में है तथा कृषि उपज के व्यापार (जिसमें निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार शामिल है) को हर तरह से बंधनमुक्त करने की बात कही थी. हर खरीद पर एमएसपी लागू करना वैसे भी व्यवहारिक नहीं है. अनेक किसानों का माल मूल्य गारंटी की वजह से बिक नहीं पाएगा. फिर सरकार ही उनकी उपज खरीदने को विवश होगी. इसका भार करदाता पर आएगा.