Left supremacy prevails, BJP dreams in Kerala shattered

ब्लाक पंचायतों, जिला पंचायतों, नगरपालिकाओं और महानगर पालिकाओं में उसका खाता ही नहीं खुला.

केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से कुछ माह पूर्व सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) ने स्थानीय निकाय चुनावों में जबरदस्त जीत हासिल की. इस दक्षिणी राज्य में बीजेपी के सपने पूरे नहीं हुए, बल्कि बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए को हर जगह शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा. ब्लाक पंचायतों, जिला पंचायतों, नगरपालिकाओं और महानगर पालिकाओं में उसका खाता ही नहीं खुला. इससे साबित होता है कि बीजेपी की दौड़ दक्षिणी भारत में सिर्फ कर्नाटक तक ही है.

इसके बाद वह पूरी तरह नाकामयाब है. बीजेपी केरल में कदम जमाना चाहती थी. ये चुनाव उसके लिए जमीनी स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण थे लेकिन लेफ्ट मोर्चे ने उसे करारी शिकस्त दी. स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने 612 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को उतारा था लेकिन उसका यह पैंतरा भी विफल रहा. बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को समझ में आ गया होगा कि केरल में लेफ्ट का मजबूत गढ़ तोड़ पाने का उसका स्वप्न पूरा नहीं हो सकता. सिर्फ बढ़-चढ़ कर बातें करने से कुछ नहीं होता. लेफ्ट का किला सिर्फ बंगाल में टूटा लेकिन केरल में वह काफी मजबूत है.

कांग्रेस को भी लगा आघात

इस चुनाव में कांग्रेस को भी आघात लगा जिसने सोना तस्करी मामले को लेकर केरल सरकार के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया था. कांग्रेस ने ड्रग से जुड़े मनीलांड्रिंग केस में सीपीएम के राज्य सचिव कोदियेरी बालकृष्ण के बेटे की गिरफ्तारी का मुद्दा भी उछाला था. इसका भी जनमानस पर कोई खास असर नहीं पड़ा. कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में सत्तारूढ़ एलडीएफ को कड़ी टक्कर देने की पूरी कोशिश की लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पाई. एलडीएफ ने 6 महानगरपालिकाओं में से 5 पर जीत हासिल की जबकि कांग्रेस नेतृत्व के यूडीएफ की सिर्फ 1 कोट्टायम महापालिका में विजय हुई. 86 नगरपालिकाओं में से यूडीएफ ने अपना वर्चस्व साबित करते हुए 45 तथा एलडीएफ ने 35 पर जीत हासिल की.

विजयन की बहुत बड़ी उपलब्धि

2019 के लोकसभा चुनाव में एलडीएफ को राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 1 सीट पर जीत हासिल हुई थी. तभी से बीजेपी सपना देखने लगी थी कि वह केरल में आसानी से पैठ बना सकती है. वह मानने लगी थी कि कम्युनिस्टों के दिन भर गए हैं लेकिन निकाय चुनाव में लेफ्ट की भारी सफलता ने बीजेपी के अरमानों को चूर-चूर कर दिया. ये नतीजे मुख्यमंत्री विजयन के लिए एक बड़ी उपलब्धि हैं. सीपीएम के राज्य महासचिव बालकृष्णन अपने बेटे की गिरफ्तारी के बाद छुट्टी पर जाने के लिए बाध्य किए गए थे. यद्यपि स्थानीय निकाय चुनाव विधानसभा चुनाव से बिल्कुल भिन्न हैं, फिर भी इन चुनाव परिणामों को राज्य की एलडीएफ सरकार के पक्ष में जनमत संग्रह माना जा रहा है.

बीजेपी वैकल्पिक ताकत बनना चाहती है

बीजेपी का लक्ष्य है कि कांग्रेस को कमजोर करते हुए वह राज्य में वैकल्पिक ताकत बन जाए. चुनाव में बीजेपी और एनडीए के उसके सहयोगियों ने कई जगहों पर कांग्रेस के वोट काटने का काम किया. बीजेपी ने ईसाई समुदाय पर डोरे डालने की कोशिश की क्योंकि मुस्लिम लीग के एलडीएफ में बढ़ते प्रभाव की वजह से चर्च के नेताओं में नाराजगी देखी जा रही है. कोच्चि और त्रिचूर महानगरपालिका में यूडीएफ का वर्चस्व घटना यही दिखाता है कि उसके परंपरागत ईसाई वोट उससे छिटकने लगे हैं. बीजेपी इस स्थिति का फायदा उठाना चाहती है.

सबरीमाला मामले का असर

बीजेपी ने पलक्कड़ नगरपालिका में अपना वर्चस्व कायम रखा. वह उन स्थानों में सफल रही जहां महिलाओं के सबरीमाला में प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का जनता ने विरोध किया था. एलडीएफ सरकार इस फैसले को लागू कराने में लगी थी. एनडीए ने अंगमाली नगरपालिका में भी चुनाव जीता जहां ईसाई समुदाय का वर्चस्व है. कन्नूर में भी एनडीए को सफलता मिली जहां सीपीएम कार्यकर्ताओं और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक संघर्ष होते रहते हैं. तिरुवनंतपुरम महापालिका में हार से बीजेपी दुखी है.  उसने प्रचार कर रखा था कि वहां प्रधानमंत्री मोदी के दौरे पर आने के समय बीजेपी का महापौर उनका स्वागत करेगा.