मराठा, ओबीसी के बाद धनगर समाज ने दी चेतावनी, आरक्षण आंदोलन के चक्रव्यूह में सरकार

    महाराष्ट्र में कोरोना की महामारी से निपटने वाली सरकार अभी दो घड़ी चैन से बैठी भी नहीं थी कि जातिगत आरक्षण की मांगों को लेकर मराठा समाज, ओबीसी और धनगर समुदाय ने सड़क पर उतरना शुरू कर दिया है. आरक्षण आंदोलन के चक्रव्यूह में फंसी सरकार बचने के लिए किस अभिमन्यु को लगाती है, इसका इंतजार पूरा महाराष्ट्र कर रहा है. सामाजिक आंदोलन की महाराष्ट्र में पुरानी परंपरा रही है, मात्र पिछले कुछ वर्षों में इन आंदोलनों को राजनीतिक दलों ने हाईजैक कर लिया था. विशेष रूप से जब 2014 से 2019 तक महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना सरकार थी, तब मराठा आंदोलन ने यह दिखाने की कोशिश की थी कि वह गैर राजनीतिक आंदोलन कर रहे हैं. हश्र यह हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को यह साबित करने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ी कि वे ब्राम्हण होने के बाद भी मराठा समाज को आरक्षण देने का माद्दा रखते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को रद्द कर दिया, देवेन्द्र भी सीएम नहीं हैं और कांटों भरा ताज उद्धव ठाकरे के सिर पर है. 

    समाज के संयम की परीक्षा

    वास्तव में महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दल आरक्षण के नाम पर शुरू हुए तीनों समुदायों के आंदोलन से निपटने में अब तक किसी कारगर रणनीति पर काम नहीं कर पा रहे हैं. मराठा आरक्षण भले ही पिछली सरकार ने दिया था, लेकिन तकनीकी मुद्दों पर वह भी जानती थी कि इसका अदालत में टिक पाना असंभव जैसा है. जानती तो महाविकास आघाड़ी की सरकार भी थी, लेकिन राज्य के कद्दावर मंत्री अशोक चव्हाण की अगुवाई में बनी समिति को यह भार दिया गया था कि वह अदालती लड़ाई को फतह करे. बड़े वकील लगाकर भी यह लड़ाई महाराष्ट्र सरकार जीत नहीं पाई. ऐसे में जैसे ही आरक्षण रद्द हुआ, मराठा समाज का संयम टूट गया. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कार्यशैली सभी को लेकर चलने वाली है. साथ ही वह समय-समय पर यह बताने से भी नहीं चूकते कि हकीकत क्या है! कोरोना की दूसरी लहर में सबसे पहले लॉकडाउन लगाने का फैसला लेने वाले सीएम ने जनता को अपने संबोधनों में बार-बार यह आगाह किया था कि यदि वे प्रतिबंधों का पालन नहीं करेंगे तो इस महामारी को नहीं रोका जा सकेगा. इसी स्टाइल का वो मराठा आरक्षण के मुद्दे पर भी उपयोग कर रहे हैं. एक तरफ वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से मराठा समाज को आरक्षण देने की घोषणा करते हैं और साथ ही यह भी बताना नहीं भूलते कि आरक्षण की मर्यादा बढ़ाने का अधिकार केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के पास है.

    अपनी डफली-अपना राग

    राज्य में अलग-अलग समुदाय के नेता अपनी डफली-अपना राग अलाप रहे हैं. मराठा को आरक्षण देने का विरोध किसी का नहीं है, लेकिन ओबीसी समाज को लगता है कि कहीं सरकार उनका कोटा न कम कर दे. ऐसे में वे भी अपने अधिकारों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सजग हैं. उसी तरह धनगरों ने जब 2012 में आरक्षण की लड़ाई को धार देना शुरू किया था, तब बीजेपी ने इस आंदोलन में घुसपैठ कर दी थी. बाद में जैसे ही महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार आई, वह पूरे 5 साल में धनगरों को आरक्षण नहीं दे पाई. अब सरकार गई तो फिर विधायक गोपीचंद पडलकर जैसे नेता को आगे कर समाज को सड़क पर लाने का राज्यव्यापी कार्यक्रम शुरू हो गया है. वैसे धनगरों को मनाने के लिए बीजेपी ने डा. विकास महात्मे को राज्यसभा भी भेजा था. समाज को ऐसे कई नेता मिले जो यह कहते रहे कि उनके लिए मंत्री-विधायक-सांसद के पद से ज्यादा समाज का आरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन हमेशा की तरह यह भी जुमला ही साबित हुआ. 

    आंदोलनों को सरकार की भी सरपरस्ती

    इन दिनों एक नई तरह की कार्यप्रणाली देखने को मिल रही है. आंदोलनों को सरकार की सरपरस्ती बढ़ती जा रही है. जैसे मराठा आंदोलन की बुधवार को जब कोल्हापुर में शुरुआत हुई तो सर्वदलीय नेताओं ने इसको समर्थन दिया. एक दिन पहले ही उपमुख्यमंत्री अजीत पवार यह बोल चुके थे कि 2 मंत्री विधिवत आंदोलन में शामिल होकर सरकार का पक्ष रखेंगे. बहुत पुरानी बात नहीं है, पिछले दिनों जब महाराष्ट्र की आघाड़ी सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण को खत्म किया तब उर्जा मंत्री नितिन राऊत अपनी ही सरकार पर भड़क गए थे. बहरहाल छोटे पवार ने अब तक उनको लॉलीपॉप ही थमाया है. उसी तरह ओबीसी आंदोलन को लेकर मंत्री विजय वडेट्टीवार मोर्चा संभाले हुए हैं. कहा जाता है कि प्रदेशाध्यक्ष नाना पटोले और उनके खेमे के कई विधायकों का समर्थन वडेट्टीवार के साथ है. इसी ओबीसी कार्ड को लेकर कांग्रेस बहुत तेजी से राकां और शिवसेना को भी घेरने में सुस्ती नहीं कर रही है. राकां के नेता छगन भुजबल पहले से ही ओबीसी के स्वयंभू नेता हैं. उनको सीनियर पवार का सीधा आशीर्वाद भी है. बीजेपी की बेबसी यह है कि वह किसी भी सामाजिक आरक्षण के मुद्दे पर कड़ी भूमिका नहीं अपना सकती है. आरक्षण का मुद्दा केन्द्र सरकार के अधीन होता है और हर बात आकर दिल्ली में ही रुक जाती है. बुधवार को जब शिवसेना के सांसद धैर्यशील माने ने मराठा आरक्षण के लिए लोकसभा के विशेष अधिवेशन का मुद्दा उठाया तो बीजेपी को बगलें झांकनी पड़ीं. सवाल यह है कि नेता-विधायक-मंत्री क्या सिर्फ अपने राजनीतिक वोटबैंक के लिए सामाजिक आरक्षण के मुद्दे को हैंडल करेंगे या फिर कोई ठोस हल भी निकालेंगे?

    असल मुद्दे दरकिनार हुए

    जब भी आरक्षण के मुद्दों को देश या प्रदेश में हवा दी जाती है, तब यह समझना होगा कि महंगाई-गरीबी-भुखमरी और आम जनता के जनजीवन से जुड़े मुद्दे दरकिनार हो जाते हैं. नेताओं को भी यह सब अच्छा लगता है. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार में शामिल आघाड़ी के दलों में इतनी लड़ाई है कि उसे विपक्ष की जरूरत ही नहीं पड़ती. और तो और, जब बीजेपी से लड़ना हो तो वह तीनों एक साथ होकर हमलावर बन जाते हैं. अब राज्य की जनता को ही जागना होगा और अपने जनप्रतिनिधियों से सीधा सवाल करना होगा कि मेरे अधिकार का आरक्षण मुझे कब मिलेगा?