धनकुबेरों में परोपकार की भावना क्यों नहीं

    उदारता मनुष्य को बड़ा बनाती है जबकि कृपणता या कंजूरी उसे बहुत ही अदने किस्म का स्वार्थी व्यक्ति बना देती है. इसीलिए कहा गया है- अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए! इंसान करोड़ों-अरबों-खरबों की दौलत कमा ले तो भी यह अटल सत्य अपनी जगह रहता है कि वह खाली हाथ इस दुनिया में आया था और खाली हाथ ही जाएगा.

    गुरुनानक ने एक अत्यंत धनी किंतु कंजूस व्यक्ति से कहा कि तुम अपनी ओर से तो किसी को कुछ देते नहीं लेकिन मेरा एक काम कर दो. मैं तुम्हें एक छोटी सी सुई देता हूं जिसे तुम मरने के बाद दूसरी दुनिया में जाकर मुझे वापस कर देना. उस व्यक्ति ने कहा, यह कैसे संभव है. मरते समय मैं आपकी सुई कैसे साथ लेकर जाऊंगा. इस पर गुरुनानक ने कहा कि जब तुम इतनी छोटी सुई साथ नहीं ले जा सकते तो इतनी धन दौलत तुम्हारे किस काम की. वह भी यहीं रह जाएगी. इसलिए इस धन से परोपकार कर डालो. पता नहीं कब मौत आ जाए. गुरुनानक की इस सीख से उस कंजूस की आंखें खुल गईं और वह उदार व दानशील बन गया.

    सोनू सूद ने प्रवासी मजदूरों की मदद की थी

    अभिनेता सोनू सूद (Sonu Sood) ने टि्वटर पर देश के अरबपतियों को आईना दिखाते हुए कहा कि दुनिया में 2 तरह के गरीब हैं. एक जो हालात के मारे हैं और दूसरे वे जो इन गरीबों की मदद नहीं कर पाए. ये दूसरे वाले लोग पहले वालों से बड़े गरीब हैं. सोनू को यह कहने का हक इसलिए है क्योंकि उन्होंने इंसानियत के नाते कोरोना (Coronavirus) कालमें गरीबों की यथाशक्ति मदद की थी. गत वर्ष कोरोना की वजह से लॉकडाउन (Lockdown) लाने पर लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर मुंबई,  (Mumbai Laborers) गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा व दिल्ली से उत्तरप्रदेश और बिहार के अपने गावों को पैदल ही लौटने को विवश हुए थे. शहरों में उनके लिए नौकरी-रोजगार खत्म हो चुके थे. न रहने का ठिकाना था, न खाने का! वहां भूखे मरने की बजाय उन्होंने अपने गांव लौटना उचित समझा. पत्नी बच्चों को लेकर भरी धूप में सैकड़ों मील का पैदल सफर करने निकल पड़े.

    पता नहीं उनमें से कितने भूख प्यास व तबियत बिगड़ने से रास्ते में जान गवां बैठे. ऐसी भी हादसा हुआ कि रेल पटरी पर चलते लोग थककर वहीं सो गए और ट्रेन ने उन्हें कुचल दिया. ऐसे निराश्रित मजदूरों की मदद के लिए कोई बड़े उद्योगपति या बिजनेस मैग्नेट सामने नहीं आए. किसी का दिल नहीं पसीजा. वे चाहते तो जगह-जगह इन गरीबों के लिए लंगर और रैनबसेरे की व्यवस्था कर सकते थे. उन्हें कुछ आर्थिक मदद भी दे सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. बताया जाता है कि भारत में अरबपतियों की संख्या 100 से भी अधिक हो चुकी है. अपार धन संपदा व ऐशो आराप के सारे साधन होने पर भी वे दिल से कितने गरीब हैं. सर्वसमावेशकता (इनक्लूजिसनेस) का विचार इनके दिल में क्यों नहीं आता. वह इंसान ही कैसा जो दूसरे जरूरतमंद इंसान के काम न आ सके! यदि वे खुद किसी गरीब के पास जाना यरा उससे बात करना पसंद नहीं करते तो किसी विश्वसनीय चैरिटेबल संस्था या ट्रस्ट के जरिए गरीबों की किसी न किसी रूप में मदद कर सकते थे.

    एक से एक दानवीर हुए

    इस देश में राजा बिल, कर्ण, रंतिदेव, राजा शिबि महारानी हुए. महर्षि दधीचि ने तो अपनी अस्थियां तक वज्र बनाने के लिए इंद्र को दान कर दी थी. यह ठीक है किसी भी चीज का अतिरेक नहीं होना चाहिए. दान का भी नहीं. फिर भी अपना हित सुरक्षित रखते हुए दानशीलता अवश्य की जा सकती है. हिंदू धर्म में दान, इस्लाम में सबाब और ईसाई धर्म में चैरिटी का बड़ा महत्व है. समाज में रहकर समाज से अर्जित धन का कुछ अंश समाज के दीन हीन वर्ग को लौटाने में क्या हर्ज है. दरिद्रनारायण की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है. जो जरूरतमंद विवश साधनहीन और असहाय है, उसकी मदद करना मानव धर्म है.

    बिल गेट्स जैसा दृष्टिकोण क्यों नहीं

    विदेश में बिल गेट्स और वारेन बफे जैसे उद्योगपति चैरिटी करते हैं. इसके लिए वे नामी उद्योगपतियों का डिनर आयोजित करते हैं जिसमें शामिल होने वालों को अपनी हैसियत के मुताबिक चैरिटी की मोटी रकम की घोषणा करनी पड़ती है. यह चैरिटी समाज कल्याण के लिए और वंचित वर्गों की मदद के उपक्रम चलाने के लिए होती है. हमारे तथा-कथित उद्योगपति ऐसे आयोजन में शामिल नहीं होते. उन्हें दान करने में नहीं, पैसे से पैसा बनाने में दिलचस्पी है. यह बात अलग है पहले उद्योगपति धर्मशाला, कुआं, तालाब गौशाला वगैरह बनवा दिया करते थे लेकिन अब यह परोपकार की प्रवृति घटती जा रही है.