दमनकारी देशद्रोह कानून गैरजरूरी

    लंबे समय से देशवासी यह महसूस करते रहे हैं कि अंग्रेजों के शासनकाल में जनता की आवाज कुचलने के लिए जो दमनकारी औपनिवेशिक कानून बनाए गए थे, वे आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्यों लागू हैं? हमारे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व वाले सार्वभौम गणतंत्र में ऐसे गुलामी और बंधन में जकड़ने वाले काले कानूनों की जरूरत ही क्या है? इस शर्मनाक और भद्दी विरासत की गठरी क्यों हम अपने सिर पर लादे घूम रहे हैं? ऐसे दकियानूसी और जुल्म ढाने वाले कानूनों का हमारे संविधान के मूलाधिकारों से सीधा टकराव है. दीया तले अंधेरा की मिसाल यह है कि श्रेया सिंघल मामले में आईटी एक्ट की जिस धारा 66ए को 2015 में खत्म कर दिया गया था, उसके तहत अभी भी राज्यों की पुलिस ने 1,000 से ज्यादा केस दर्ज किए हैं.

    सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली न्या. एएस बोपन्ना व न्या. हृषिकेश राय की 3 जजों की पीठ ने कहा कि राजद्रोह की धारा 124ए का बहुत ज्यादा गलत इस्तेमाल हो रहा है. यह ऐसा है कि किसी बढ़ई को फर्नीचर बनाने के लिए आरी दी गई लेकिन वह इसका इस्तेमाल पूरा जंगल काटने के लिए कर रहा है. धारा 124ए के तहत शक्तियां इतनी असीम हैं कि अगर कोई पुलिसकर्मी गांव में किसी को ताश-जुआ आदि के लिए फंसाना चाहता है तो वह इस कानून का इस्तेमाल करता है. इससे लोग काफी डरे हुए हैं. हालत इतनी गंभीर है कि कोई राज्य या दल असहमति की आवाज सुनना नहीं चाहता तो इस कानून का इस्तेमाल ऐसे लोगों को फंसाने के लिए करता है.

    तिलक, गोखले और गांधी को चुप कराने के लिए था यह कानून

    चीफ जस्टिस की पीठ ने कहा कि अंग्रेज शासकों ने इस काले कानून का इस्तेमाल बालगंगाधर तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, महात्मा गांधी व अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को चुप कराने के लिए किया था. ऐसे कानूनों को जारी रखना दुर्भाग्यपूर्ण है. अब इसकी क्या जरूरत है? कोर्ट ने कहा कि हमारी चिंता कानून के दुरुपयोग और कार्यकारी एजेंसियों की जवाबदेही न होने पर है. ऐसे में इस कानून की संवैधानिकता परखनी होगी. अभिव्यक्ति की आजादी पर इसका विपरीत परिणाम हो रहा है.

    विधि आयोग की अलग-अलग राय

    विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने कभी कहा कि यह कानून खत्म हो, तो कभी कहा कि इसे जारी रखना चाहिए. 1968 में लॉ कमीशन ने 39वीं रिपोर्ट में कहा कि राजद्रोह कानून कायम रखना जरूरी है. 1971 में आयोग ने राजद्रोह कानून को और व्यापक बनाने का सुझाव देते हुए कहा कि इसमें न्यायपालिका, विधायिका और संविधान का भी समावेश करें. इन सब के विपरीत अगस्त 2018 में विधि आयोग ने केंद्र को सुझाव दिया कि धारा 124ए पर विचार करना चाहिए तथा सरकार इसे निरस्त करने के बारे में सोचे.

    असहमति को दबाने के लिए इस्तेमाल किया गया

    2019 से अब तक 816 मामलों में 10,938 भारतीयों पर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ है. यूपीए सरकार के दौरान कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में आंदोलन करने वाले 130 लोगों पर इस कानून में मामला दर्ज किया गया था. बिहार, झारखंड, यूपी, कर्नाटक व तमिलनाडु में इसके अधीन कार्रवाई की गई थी. हरियाणा के सिरसा में केंद्र के कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे 100 किसानों पर विधानसभा के उपाध्यक्ष रणबीर सिंह के सरकारी वाहन की तोड़फोड़ करने पर पुलिस ने देशद्रोह का मामला दर्ज किया था. 

    कुछ उल्लेखनीय मामले

    लाल किले पर हंगामे से जुड़े ‘टूलकिट’ मामले में दिशा रवि को गिरफ्तार किया गया था. उसे जमानत देते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा था कि असहमति रखना राजद्रोह नहीं है. सरकार की नीतियों से असहमत होने की वजह से किसी को जेल में नहीं रखा जा सकता. पत्रकार विनोद दुआ के यूट्यूब कार्यक्रम को लेकर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने मामला रद्द करते हुए कहा था कि केदारनाथ सिंह केस के फैसले के मुताबिक हर पत्रकार संरक्षण का अधिकारी है.