केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार को छोड़ UP, कर्नाटक CM के पीछे पड़े

    देश के सामने कोरोना संकट से लेकर आर्थिक मोर्चे तक महंगाई-बेरोजगारी की चुनौतियां कम नहीं हैं, इतने पर भी इन सबको दरकिनार रखते हुए ‘बीजेपी और संघ का खेला’ जारी है. वास्तविक समस्याओं के समाधान से मुंह चुराते हुए यूपी व कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के पीछे पड़ जाने में कौन सा तुक है? क्या राजनीतिक उखाड़-पछाड़ ही सब कुछ है? कहीं ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए तो ऐसा नहीं किया जा रहा है? समझ में नहीं आता कि केंद्र सरकार अपनी प्राथमिकताओं को भुलाकर इस तरह की राजनीतिक कलाबाजी को क्यों प्रोत्साहित कर रही है?

    ‘BJP और संघ का खेला’

    केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार लंबे समय से अटका हुआ है. मनोहर पर्रिकर, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली के निधन के बाद से रिक्तता भरी नहीं गई है. जो मंत्री मोदी सरकार की पहली पारी में शामिल थे, उनमें से कुछ को दूसरी पारी में स्थान नहीं दिया गया. अभी हालत यह है कि मंत्रियों को अपने विभाग के अलावा अन्य विभागों का कार्यभार भी संभालना पड़ रहा है. ऐसे में कामकाज पर असर पड़ता है. कुछ मंत्रियों का विभाग बदला जा सकता है तो कुछ नए चेहरे सरकार में शामिल किए जा सकते हैं. पार्टी में योग्य लोगों की कमी नहीं है लेकिन उन्हें मौका भी तो दिया जाना चाहिए.

    जिन राज्यमंत्रियों का काम अच्छा है, उन्हें स्वतंत्र प्रभार या पदोन्नति दी जा सकती है. कांग्रेस से बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया की योग्यता व अनुभव देखते हुए उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जाना क्या उपयुक्त नहीं होगा? सुब्रमण्यम स्वामी भी तो लंबे समय से मंत्री पद की आस लगाए बैठे हैं. इतने सीनियर व अनुभवी राजनेता के बारे में विचार क्यों नहीं किया जाता? महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को केंद्र में लिए जाने की अटकलें लंबे समय से चल रही हैं. जिन राज्यों से केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व कम है या जहां केंद्र को अपना प्रभाव बढ़ाना है, वहां के कुछ नेता भी तो मंत्री बनाए जा सकते हैं. किसी महिला नेता को भी स्थान दिया जा सकता है. आखिर मंत्रिमंडल विस्तार कब तक टलता रहेगा?

    योगी-येदि निशाने पर

    कल तक मोदी और शाह की आंखों के तारे रहे यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब क्यों आंख की किरकिरी बन गए? क्या कोरोना आपदा से ठीक से न निपट पाने, ऑक्सीजन और दवाइयों को लेकर योगी केंद्र के निशाने पर आ गए हैं? यही योगी राम मंदिर निर्माण, देवदिवाली मनाने जैसी बातों को लेकर केंद्र को प्रिय थे. योगी ने जिस तरह से यूपी में अपराधों पर काबू पाया, उसे भी मोदी सरकार व बीजेपी ने पसंद किया था. राज्य में सपा-बसपा और कांग्रेस उनके प्रभाव के सामने निस्तेज होकर रह गए थे. हिंदुत्व समर्थकों का हौसला योगी के शासन में ही बढ़ा. शायद ये सारी बातें अब बीजेपी और संघ के लिए बेमतलब हो गई हैं. बीजेपी के यूपी प्रभारी राधामोहन सिंह का राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मिलकर सीलबंद लिफाफा देना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष व महामंत्री से भी उनकी भेंट संकेत देती है कि कुछ न कुछ खिचड़ी पक रही है! कहा जा रहा है कि संभवत: योगी आदित्यनाथ की जगह किसी अन्य को उत्तरप्रदेश का सीएम बनाया जा सकता है. अगले वर्ष के शुरुआती महीनों में यूपी विधानसभा का चुनाव है. क्या ऐसे समय राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का जोखिम उठाया जा सकता है? राधामोहन के पहले बीजेपी के संगठन मंत्री बीएल संतोष ने भी 3 दिनों का लखनऊ दौरा किया था और उन्होंने उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य से बंद कमरे में आधा घंटा चर्चा की थी. यह सब अकारण नहीं है.

    क्या पंचायत चुनाव में करारी हार के बाद बीजेपी और संघ को योगी की नेतृत्व क्षमता पर विश्वास नहीं रहा? क्या उन्हें लगता है कि विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने में योगी विफल रहेंगे? यह सारी खटपट कुछ ऐसा ही संकेत देती है. इसके अलावा कर्नाटक के सीएम येदियुरप्पा की कुर्सी भी डगमगा रही है. राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों पर चुप्पी तोड़ते हुए 78 वर्षीय येदियुरप्पा ने कहा कि जिस दिन उनसे पद छोड़ने की मांग की जाएगी, वह उसी दिन इस्तीफा दे देंगे. येदि का कड़ा बयान बीजेपी के उपाध्यक्ष और उनके बेटे बीवाई विजयेंद्र के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने के कुछ दिनों बाद आया है. क्या येदि को संकेत दे दिया गया है कि उन्हें कुर्सी खाली करनी पड़ सकती है?