केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल, कठपुतलियों की जगह दमदार मंत्री

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल रूपी सर्जरी कर अपनी सरकार को अधिक सक्रिय, कर्मठ और प्रभावशाली रूप देने की दिशा में सार्थक कदम उठाया है. अब कठपुतलियों की जगह दमदार मंत्रियों को स्थान दिया गया है. यह उचित भी है क्योंकि सरकार अनेक मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रही है और उसे ऐसे मंत्रियों की दरकार है जो उत्साह और सूझबूझ के साथ ठोस कार्य करें. आरामतलब या कुर्सी तोड़ने वाले मंत्री किसी काम के नहीं होते. मंत्री जमीन और जनता से जुड़ा होना चाहिए. कोरी बयानबाजी और टाइमपास करने वाले मंत्री ज्यादा समय मोदी सरकार में चल नहीं पाते. पहले भी मोदी ने उमा भारती और मेनका गांधी को इसीलिए हटा दिया था क्योंकि वे उनकी कार्यशैली से संतुष्ट नहीं थे. यह काफी अच्छी बात है कि बीजेपी की अपने दम पर सरकार है, इसलिए उन्हें वैसा तुष्टीकरण नहीं करना पड़ता जैसा 24 पार्टियों की एनडीए सरकार चलाने वाले अटलबिहारी वाजपेयी को करना पड़ता था.

    सहयोगी दलों की आशा-आकांक्षा का ध्यान रखा

    यद्यपि मोदी के निर्णयों को कोई प्रभावित नहीं कर पाता, फिर भी सहयोगी दलों की आशा-आकांक्षा का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है. पार्टी के जिन काबिल लोगों को अभी तक मौका नहीं मिल पाया है और लंबे समय से वेटिंग में रहे हैं, उन्हें भी अवसर देना उचित है. सहयोगी पार्टी जदयू ने 4 मंत्री पदों की मांग रखी थी तो नारायण राणे और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बीजेपी में आने के बाद से मंत्री पद पाने के लिए इंतजार में थे. कुछ केंद्रीय मंत्रियों के पास अनेक विभागों का कार्यभार था, जिन्हें राहत देना जरूरी था. इसलिए कुछ विभाग उनसे लेकर नए मंत्रियों को सौंपा जाना एक उचित कदम कहा जाएगा.

    गठबंधन के साथियों के सामने झुकी BJP

    प्रधानमंत्री जानते हैं कि परिस्थितियां काफी विषम और चुनौतीपूर्ण हो गई हैं और सरकार विपक्ष के निशाने पर है. कोरोना महामारी से निपटने में विफलता, प्रवासी मजदूरों का पलायन, भारी बेरोजगारी और बेतहाशा बढ़ती महंगाई से उफनता जन असंतोष मोदी सरकार की लोकप्रियता को तहत-नहस कर रहा है. मानवाधिकार हनन जैसे मामलों से विदेश में भी सरकार की साख गिरी है. बोतल के भूत के समान एक बार फिर राफेल डील सामने आ गई है. बड़े आर्थिक अपराधियों को विदेश से पकड़ लाने में सरकार को सफलता नहीं मिली है. पार्टी सांसद होने पर भी सुब्रमण्यम स्वामी सरकार पर विषबुझे तीर छोड़ते रहते हैं. ऐसी स्थिति में बीजेपी अपने भारी बहुमत के बावजूद सहज नहीं है. उसे गठबंधन के साथियों के सामने झुकना पड़ा है. आगामी चुनाव में एनडीए के यही सहयोगी काम आएंगे, इसलिए उन्हें महत्व और प्रतिनिधित्व देना जरूरी है. इसके साथ ही यह भी देखना पड़ता है कि राज्यों, महिलाओं, युवा व पिछड़े वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व मिले. मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह व बीजेपी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष के साथ 2 दिनों तक मंत्रणा करने के बाद इस सर्जरी को अंजाम दिया है. इसमें निष्क्रिय मंत्रियों की छुट्टी और सक्रिय लोगों को बढ़ावा देने व नए चेहरे लाने का उपक्रम शामिल है. कुछ को संगठन की जिम्मेदारी दे दी गई है.