सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद भी बीजेपी में, राहुल के करीबियों में से 2 बाहर

    कांग्रेस अपने कुनबे को एक जुटनहीं रख पा रही है. ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के बाद जितिन प्रसाद ( (Jitin Prasada) ने भी पार्टी छोड़ दी और बीजेपी (BJP) में शामिल हो गए. कांग्रेस में लेटर बम के जरिए बगावत का सुर बुलंद करनेवाले जी-23 समूह के नेताओं में शामिल जितिन के बीजेपी में जाने के बाद कई अन्य कद्दावर नेताओं के कांग्रेस (Congress) छोड़कर बीजेपी में जाने का अनुमान लगाया जा रहा है. ऐसा माना जाता है कि जितिन के जरिए बीजेपी ने यूपी विधानसभा चुनाव के पूर्व अपना पहला राजनीतिक पासा फेंका है और प्रदेश में ब्राम्हण चेहरे और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को अपने खेमे में जाने में कामयाबी हासिल की है.

    यह राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ा झटका है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद दोनों ही राहुल के मित्रों में शामिल रहे हैं.  राहुल के करीबियों में से अब सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा ही कांग्रेस में बचे हैं. माना जा रहा है कि आने वाले समय में कुछ और नेता कांग्रेस का साथ छोड़ सकते हैं जितिन प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस से 3 पीढ़ियों का नाता तोड़ने के लिए उन्हें लंबा विचार करना पड़ा. उन्होंने यह फैसला अचानक नहीं लिया बल्कि पार्टी नेतृत्व में प्रभावित होकर बीजेपी ज्वाइन की. राजनीतिक दल सेवा का माध्यम होते हैं लेकिन कांग्रेस में रहते हुए जनहित की रक्षा करना संभव नहीं था. केवल बीजेपी सही मायने में देश का एकमात्र संस्थागत राजनीतिक दल रह गया है.

    ब्राम्हणों को साधने की कोशिश

    कहा जाता है कि यूपी से ब्राम्हणों का एक बड़ा तबका बीजेपी से नाराज रहा है हालांकि उनकी नाराजगी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से है जो ठाकुरों में लोकप्रिय है. इसका चुनाव में नुकसान हो सकता है. इसलिए बीजेपी ने जितिन प्रसाद को पार्टी में शामिल कर ब्राम्हणों को बड़ा संदेश दिया है. जितिन लंबे समय से ब्राम्हण समाज के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं. उन्होंने ब्रम्ह चेतना कार्यक्रम भी चलाया था. इसके पूर्व यूपी में गोविंद बल्लभपंत व कमलापति त्रिपाठी जैसे ब्राम्हण मुख्यमंत्री हुए थे. मायावती ने सोशल इंजीनियिरंग करते हुए दलित और ब्राम्हणों को साथ लिया था. जितिन प्रसाद ने 2004 में यूपी की शाहजहांपुर और 2009 में घौरहरा सीट से लोकसभा चुनाव जीता. यूपीए सरकार ने उन्हें युवा व खेल राज्यमंत्री बनाया. बाद में उन्हें इस्पात व सड़क परिवहन राज्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई. 2011-12 में वे पेट्रोलियम मंत्रालय व 2012-14 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे. जितिन प्रसाद को बंगाल में एआईसीसी का इंचार्ज बनाया गया था. लेकिन वहां कांग्रेस को एक सीट भी नहीं मिल पाई.

    सचिन पायलट भी नाराज

    राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने असंतोष जताते हुए कहा कि पार्टी हाईकमान ने जो वादे किए थे उन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं होना दुखद हैं. मुझे बताया गया था कि सुलह कमेटी तेजी से एक्शन लेगी लेकिन आधा कार्यकाल निपट गया और मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत रोजाना राजनीतिक नियुक्तियां कर रहे हैं जिसमें पार्टी कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिल रही है. राजनीतिक पदों पर रिटायर्ड अधिकारियों को बिठाया जा रहा है. एआईसीसी महासचिव तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जीतेंद्रसिंह ने मांग की कि सचिन पायलट को जो भी वादा किया गया था उसे निभाया जाना चाहिए.

    कांग्रेस हाईकमान अभी भी नींद में

    एक समय ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट व मिलिंद देवडा कांग्रेस का भविष्य समझे जाते थे. ये सभी राहुल गांधी के विश्वसनीय मित्रों में से थे. सिंधिया व जितिन प्रसाद के बीजेपी में जाने से साफ हो गया कि कांग्रेस हाईकमान अभी भी नींद में है. वह पार्टी को संभाल नहीं पा रहा. जी-23 नेताओं का असंतोष भी दूर नहीं हो पाया. बीजेपी ने कांग्रेस नेताओं को अपने पाले में खींचने का सिलसिला जारी रखा है. अगले वर्ष मार्च में उत्तरप्रदेश विधानसभा की चुनौती है. अब भी कांग्रेस अपने नेताओं को उचित महत्व दे और उनकी शिकायतें दूर करें तो बात बन सकती है.