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अमरावती. सोयाबीन व बोंड इल्लियों के कारण कपास की फसल हाथ से निकल जाने के बाद अब तुअर पर ही किसानों की उम्मीदें टिकी है, लेकिन अब तुअर पर भी इल्लियों का प्रकोप दिखाई दे रहा है. गत 8 दिनों से लगातार बादलों के कारण इल्लियों का प्रमाण बढ़ता जा रहा है. हालांकि इसी दौरान तुअर फल्लियां भरने की दौर होता है. ऐसे में किसानों की समस्या में बाधाएं निर्माण हो रही है. वहीं दूसरी ओर उंट से भेंड हकालने का काम कृषि विभाग द्वारा किए जाने का आरोप किसानों द्वारा किया जा रहा है.

तुअर पर फल्लियां खानेवाले इल्लियों का प्रादुर्भाव होने से इस वर्ष भी उत्पादन में बड़े पैमाने पर घट होने की संभावना किसानों ने व्यक्त की है. महंगे किटनाशक से छिड़कांव करने के बाद भी इल्लियां का प्रादुर्भाव कम होने का नाम नहीं रहे है. जिससे फसल कांटने की नौबत कुछ क्षेत्र के किसानों पर आयी है.

सितंबर व अक्तूबर माह में लगातार होनेवाली बारीश व बोगस बिज से सोयाबीन व कपास उत्पादक किसानों का इस वर्ष तगड़ा झटका लगा है. जैसे तैसे किसान इससे उभकर कर कपास से गुलाबी बोंड इल्लियों का प्रादुर्भाव हुआ. जिससे कपास में भी बड़े पैमाने पर घट होने की संभावना है. महंगे किटनाशकों का छिड़कांव करने के बाद भी इल्लियों का प्रादुर्भाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. जिससे कृषि विभाग ने किसानों को बांध पर मार्गदर्शन करना चाहिए ऐसी मांग की जा रही है.

फुलोरा से तुअर हुई पिली

चांदूर बाजार तहसील में तुअर का क्षेत्र पिला हो चुका है. लेकिन बादलों के कारण फल्लियां खानेवाली इल्लियों का प्रादुर्भाव कम होने से तुअर को आनेवाला बौर भी अब नष्ट हो रहा है. तहसील में मुख्य रुप से आशा, मारोती, चारु, प्रभा, साधना, मुन्नी आदि तुअर फसलों का उत्पादन लिया जाता है. अर्ली वेरायटी में जिस तुअर को फल्लियां आयी है वह मार्केट में 70 से 100 रुपये किलो बेची जा रही है.

उत्पादन में कमी आने की संभावना

परिसर के कुछ किसान आंतरफसल की रुप में तुअर का चयन करते है. तो कुछ किसान लगातार ही तुअर की बुआई करते है. लेकिन बादलों के कारण इल्लियों का प्रादुर्भाव में कमी आने की संभावना है. बारीश इतनी हुई कि सोयाबीन की कटाई करने की नौबत ही नहीं आयी. किसी ने रोटावेटर चला लिया तो कईयों ने खेत में मवेशी छोड़े, गुलाबी बोंड इल्लियों के कारण कपास का उत्पादन भी घटा अब तुअर की बारी है. इसलिए कृषि विभाग ने भी जो भी योजनाएं है वह किसानों तक पहुंचानी चाहिए.- कौस्तूभ घुटे, शेतकरी, अचलपूर