अवस्था : प्रत्यक्ष में केवल 5-6 संस्था कार्यरत, मेलघाट में गांव 305 और एनजीओ 321

  • अधिकांश केवल कागजों पर

चुरणी. व्याघ्र प्रकल्प के साथ मेलघाट कुपोषण से होने वाली मौतों के लिए भी जाना जाता है. कुपोषण के इस कलंक को मिटाने के लिए स्वास्थ्य विभाग, बाल कल्याण विभाग के माध्यम से विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की जाती है. लेकिन इतने वर्षों में दोनों विभागों को अनुमानित सफलता नहीं मिल पा रही है. दोनों विभागों के साथ मेलघाट के 305 गांवों में 321 सेवाभावी संस्थाएं (एनजीओ) कार्यरत है. इनमें से पांच से छह को छोड़ दिया जाए तो अन्य एनजीओ केवल धर्मदाय आयुक्तालय के रजिस्टर पर ही दर्ज है.

फूंके जा रहे करोड़ों रुपए 

मेलघाट की विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से करोड़ों रुपए फूंके जा रहे है. फिर भी मातामृत्यु व बाल मृत्यु की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है. उसी प्रकार मुंबई, दिल्ली में बनी स्वास्थ्य योजनाएं तथा अनेक कल्याणकारी योजनाएं होने के बावजूद यह सिलसिला बदस्तूर है. इस वजह से सरकार व प्रशासन को आत्मपरिक्षण की आवश्यकता है. चैरिटी कमिश्नर कार्यालय में पंजीकृत 321 संस्थाओं में राष्ट्रीय, आंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हैं.

1000 के पीछे 1 एनजीओ

मेलघाट के 305 गांवों की आबादी लगभग 3 लाख है. उनके लिए 321 की संस्था कार्यरत है. मसलन 935 नागरिकों के पीछे एक संस्था है. एक एनजीओ ने हर गांव में इमानदारी से काम किया तो मेलघाट की सभी समस्याएं हल हो सकती है. लेकिन अनेक संस्थाएं कागज पर बोगस काम बताकर करोडो रुपए ऐंठ रहे है. सरकार, प्रशासन को ऐसी संस्थाओं पर नकेल कस समन्वय से काम करने की आवश्यकता है. 

राजनीतिज्ञों की संस्थाएं अधिक

मेलघाट में कागजों पर चलने वाली संस्थाओं में राजनीतिक लोगों की अधिक होने की जानकारी है. यह संस्थाएं एक दूसरे की ओर उंगलियां दिखाकर किनारा कर लेते है. इन संस्थाओं को प्रशासन का भी आशीर्वाद रहता है. जिसके चलते मेलघाट आज भी बुनियादी विकास को तरस रहा है. परिणाम स्वरुप विकास से कोसों दूर है.