लिखकर ले रहे सहमति पत्र, अभिभावकों पर थोप रहे जिम्मा

  • 9 वीं 10-11 व 12 वीं स्टूडेंट भी दुविधा में    

अमरावती. राज्य सरकार ने 23 नवंबर से नौवीं, दसवीं और ग्यारहवीं-बारहवीं तक स्कूल-कालेज शुरू करने का निर्णय लिया है. इसके लिये तैयारियों शुरू हो गई है. स्कूल व कनिष्ठ महाविद्यालय प्रशासन अभिभावकों से सहमति पत्र भरवा ले रहा है. जिसमें कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षात्मक 8 तरह की शर्तें व नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ अभिभावकों की होने की बात स्पष्ट रुप से दर्ज की गई है.

हालांकि अभिभावकों को अपने बच्चों को स्कूल-कालेज भेजना है या नहीं, यह मत सहमति पत्र पर दिए गए हां अथवा नहीं के रुप में दर्ज करने की छूट इच्छानुरुप दी जा रही है. लेकिन अपने पाल्यों को स्कूल-कालेज भेजने का साहस जुटाने वाले अभिभावक यह फार्म पढ़ने के बाद सकते में आ गए है. संबंधित स्टूडेंट भी दुविधा में नजर आ रहे हैं.      

8 शर्तों के पालन का जिम्मा अभिभावकों पर 

स्कूल व कनिष्ठ महाविद्यालयों द्वारा दिए जा रहे फार्म में अभिभावक की जिम्मेदारी का उल्लेख कर 8 शर्तें दी है. शर्त क्रमांक 1) -विद्यार्थियों को घर से मास्क लगाकर भेजे, साथ पीने के पानी की बोतल दें. 2) विद्यार्थियों को मास्क लगाने की आदत डाले. 3) चेहरे को स्पर्श ना करने की आदत लगाए. 4) साबून से हाथ धोने की आदत लगाए. 5) बाहर की किसी भी वस्तुओं का ना छुए. 7) दूसरे किसी भी व्यक्ति से बात करते समय 6 फीट का अंतर रखे. 6) घर में एन्ड्राइड मोबाइल फोन आवश्यक समय के लिए अभिभावकों की उपस्थिति में पाल्यों को उपलब्ध कराए. 8) पाल्यों को बुखार, खांसी व जुकाम अथवा किसी भी तरह की बीमारी होने पर स्कूल-कालेज ना भेजे.  

संभ्रम में पड़े अभिभावक

स्कूल-कालेज में इस तरह के उपाय करने की संपूर्ण जिम्मेदारी अभिभावकों पर डाले जाने की बात सामने आने से अब अभिभावकों में इस बात को लेकर संभ्रम देखा जा रहा है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बारे में शासन-प्रशासन द्वारा सचेत रहने की चेतावनी दिये जाने के बीच इस तरह अभिभावकों से फार्म भरकर लेने का सीधा अर्थ है कि यदि कोई विद्यार्थी स्कूल-कालेज आने पर कोरोना संक्रमित हो जाता है तो इसकी कोई जवाबदेही स्कूल-कालेज प्रशासन अथवा शासन की नहीं होगी.   

एक्शन प्लान बनाएंगे 

जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गुरुवार को मीटिंग हुई. जिसमें कुछ गाइड लाइन दिए गए है. उसके अनुसार ही एक्शन प्लान बनाया जाएगा. हालांकि स्कूल में छात्रों को भेजना अनिवार्य नहीं है. पालक चाहे तो ही भेज सकते है. लेकिन नहीं भेजने वाले छात्रों के लिए भी क्या व्यवस्था की जाए. अथवा भेजने के बाद स्कूल में क्या होना चाहिए. इस पर भी स्कूलों को आदेश दिए जाएंगे.-वामन बोलके, शिक्षाधिकारी माध्यमिक  

नियमों का पालन करने के आदेश 

शालाओं को सैनिटाइज्ड करना, बच्चों के लिए सैनिटाइजर, ऑक्सिमीटर रखना, थर्मल स्कैनिंग का प्रबंध करना अनिवार्य कर दिया है. शाला परिसर तथा स्वच्छता गृह भी स्वच्छ रखने के आदेश दिए है. साथ ही अभिभावकों से सहमति पत्र लिखवाने के आदेश दिए है. एक कक्षा की संख्या अधिक है तो छात्रों को ऑड इवन फार्मूले से स्कूल में बुलाना पड़ेगा. -अब्दुल राजिक, शिक्षणाधिकारी मनपा

ग्रामीण में कहां से करेंगे खर्च 

शालाएं शुरू होने के बाद स्कूल को डेली सैनिटाइज्ड करना, छात्रों के लिए आक्सिमीटर और थर्मल स्कैनर लाना अनिवार्य है. ग्राम पंचायत एक दिन आकर सैनिटाइज्ड कर चली जाएगी, लेकिन यह बात रोजाना की है. शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षा का प्रमाण कम होने से अधिकांश छात्र स्कूल में दाखिल होंगे. ऐसे में शिक्षक के साथ-साथ छात्रों के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए थी. अब शिक्षकों पर यह खर्च उठाने के साथ-साथ बच्चों की भी जिम्मेदारी डाल दी जा रही है. इसलिए स्कूल में भेजने हेतु अभिभावकों से आवेदन भराए जा रहे है. -किरण पाटिल, राज्य उपाध्यक्ष, अभा शिक्षक संघ

कौन लेगा जिम्मेदारी

विद्यार्थियों को स्कूल-कालेज भेजने पर शिक्षकों की सुरक्षा के भी पुख्ता प्रबंध करना अनिवार्य होगा. साथ ही शिक्षकों पर अध्यापन के अलावा कोई जिम्मा ना डाला जाए. अन्यथा सैनिटराइजेशन और थर्मल स्क्रिनिंग की भी जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी गई तो मुश्किल होगा. हम इसका कड़ा विरोध करेंगे. -शेखर भोयर, शिक्षक महासंघ 

पल्ला झाड़ रहा शासन-प्रशासन

शिक्षकों को कोविड-19 की जांच करना अनिवार्य है, लेकिन शाला में आने वाले छात्रों के लिए वैसी व्यवस्था नहीं है और नहीं कोई सूचना है. शाला में यदि कोई छात्र कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है तो उसकी जिम्मेदारी किस पर रहेगी यह भी शासन ने बताना चाहिए. सहमति पत्र लेने का सीधा अर्थ है कि शासन-प्रशासन अपना पल्ला झाड़ रहा है. -संगीता शिंदे, शिक्षक