दुर्लभ ‘कवड्या टिलवा’ के दर्शन, बोरगांव बांध परिसर में दिखा पक्षी

    अमरावती. शहर से सटे बोरगांव बांध परिसर में दुर्लभ कीचड पक्षी ‘कवडया टिलवा’ की उपस्थिति दर्ज की गई. आम तौर पर 19 से 19.5 सेमी अपनी सीधी चोंच के कारण ‘कवड्या टिलवा’ पक्षी का मराठी में वैकल्पिक नाम ‘चंचल तुतवार’ है. इसका अंग्रेजी उपनाम ‘सैंडरलिंग’ और शास्त्रीय उपनाम ‘कैलेड्रिस अल्बा’ है. यह पक्षी अपने प्रणय के मौसम का अधिकांश समय पूर्वोत्तर साइबेरिया और अलास्का में बिताता है.

    सर्दियों के प्रवास के दौरान, यह पक्षी अन्य पक्षियों के साथ झुंड में भारत के समुद्र तटों पर आ जाता है. यह पश्चिमी तट और निकोबार द्वीप समूह में कम और पूर्वी तट पर अधिक पाया जाता है. विश्वस्तरीय ई-बर्ड वेबसाइट पर उपलब्ध अभिलेखों का अध्ययन करने के बाद विदर्भ में ‘कवड्या टिलवा’ की मौजुदगी पहली बार दिखा दर्ज की गई है. 

    फरवरी के फोटो से हुई पहचान

    शहर के वन्यजीव फोटोग्राफर प्रशांत निकम पाटील, पीयूष महाजन, राहुल चतुरकर, संकेत राजूरकर, कौशिक तट्टे, आनंद मोहोड द्वारा फरवरी माह में पक्षी निरीक्षण के लिए किए भ्रमण के दौरान लिए फोटो से इस पक्षी की पहचान की गई. इस पक्षी में और छोटा टिलवा पक्षी से काफी समानता होने से इसे पहचानने में समय लगा. प्रशांत निकम के अनुसार ने आमतौर पर झुंड में पाए जानेवाला यह पक्षी इस क्षेत्र में अकेला पाया गया है. यह अपने नियमित प्रवास मार्ग से भटकने का अनुमान है. पक्षी की पीठ और पंखों का रंग हल्का भूरा होता है.

    प्रणय के दौरान यह लाल-भूरे रंग का दिखाई देता है. पेट साफ सफेद है और चोंच सीधी और पतली है. पैर काले हैं और उसे पिछे की उंगली नहीं हैं. हालांकि अन्य टिलवा पक्षियों के झुंड में इसे पहचानना मुश्किल है, छोटा टिलवा आकार में बड़ा होता है और पंखों पर एक अलग काला धब्बा होता है. एक बड़े जलाशय के तट पर कीचड़ में, समुद्र तट पर शिकार खोजने की कोशिश में लहरों के साथ इस पक्षी का लयबद्ध कदमताल लुभावना होता है.