संकट : पहले कोरोना, अब महंगाई ने तोड़ी आम आदमी की कमर, गृहणियां परेशान, रसोई का स्वाद फीका

    भंडारा. जहां अनेक लोग दूसरी लहर में कोरोना से रोए, अब वे बढ़ती महंगाई से भी रो रहे हैं. दिनोंदिन महंगाई बढ़ती ही जा रही है. महंगाई के कारण आए दिन विभिन्न पार्टियों द्वारा शासन के विरोध में मोर्चा निकाला जा रहा है. फिर भी महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है.

    पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल व खाद्य सामग्री के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं. ऐसे में आम जनता क्या करें ? क्या खाना ही छोड़ दें ? सिर्फ पैदल ही चले, ऐसा सवाल शहर के नागरिकों द्वारा किया जा रहा है. पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने से अन्य जरूरी सामानों के दाम भी बढ़ जाते हैं. जैसे सब्जी, फल व किराना सामान. जनता महंगाई के बोझ तले दबती ही जा रही है. शहर की गृहिणियों को अपनी रसोई का खर्च निकालना बेहद दूभर हो गया है.

    रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीजों की पूर्ति करना बड़ा मुश्किल आम आदमी में मानसिक तनाव में 

    देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए सरकार लाकडाउन के निर्देश जारी कर देती है. जिसमें सिर्फ जरूरी सामानों की सेवा को ही छूट दी जाती है. लोग अपनी जरूरत के सामान खरीद सके पर सरकार की नजर में जो गैरजरूरी सामान की दूकानें या व्यवसाय हैं, परिवार तो उनके भी हैं. वह अपनी जरूरत के सामान कैसे खरीदे.

    जब उनकी दूकान और व्यवसाय बंद पड़े होते हैं और उनकी आमदनी का कोई साधन नहीं होता. इन परिवारों के खाने पीने, दवाई, पढ़ाई, लोन की किश्तें, दूकान और मकान के किराए, बिजली और फोन के बिल और सरकार को टैक्स भी देना है, यह सब कहां से और कैसे पूरा करेंगे. महंगाई और बेरोजगारी ने आम जनता की कमर तोड़ दी है. जिसके कारण आम आदमी में मानसिक तनाव की बीमारी बढ़ती जा रही है. आज का हर मध्यमवर्गीय परिवार सबसे अधिक महंगाई की मार झेल रहा है.

    महंगाई की समस्या धीरे धीरे दानवी रूप ले रही है. आज के समय में एक साधारण इंसान के लिए परिवार का गुजारा करना मुश्किल हो गया है. यहां तक की रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीजों की पूर्ति करना बड़ा मुश्किल है. महंगाई का अर्थ वस्तुओं की कीमत में वृद्धि से है. जीवन के लिए जरूरतमंद कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आज आलम यह है कि साधारण व्यक्ति जी तोड़ मेहनत के बावजूद अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पाता है.

    मुफ्त में सिलेंडर पाने के बाद ग्रामीणों ने भी देशी चूल्हे का विकल्प खत्म कर दिया और धुआं रहित रसोई बना ली, लेकिन महंगाई ने उन्हें सोचने पर विवश कर दिया है. अब वह अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगे हैं. गरीब व मध्यमवर्गीय ग्रामीण लोगों के सामने चूल्हा फूंकने का विकल्प भी समाप्त हो चुका है. गाय पालना बंद कर दिया, जलाऊ लकड़ी भी नहीं है.

    केरोसिन भी नहीं मिल रहा. अब समस्या यह हो रही है कि अनाज मिल भी गया तो पकाएंगे कैसे. इन दिनों महंगाई अपने चरम पर है. प्याज, आलू, टमाटर ही गरीबों के थाली की शोभा बढ़ाता है, लेकिन वहीं इन दिनों लगातार इनके दामों में हो रही वृद्धि के कारण हर कोई परेशान है. महंगाई को लेकर आए दिन आम जनता और सामाजिक संस्था व राजनीतिक पार्टी के लोग अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.