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भंडारा (का). आज का युवा कल का भविष्य है. इसलिए हर घर में रहनेवाले युवा वर्ग को सही दिशा में ले जाने की नितांत आवश्यकता है, लेकिन कोरोना महामारी के संकट काल में भी अगर युवा वर्ग नशे का आदि रहा तो इसे क्या कहा जाए. शहर के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी युवा वर्ग किसी न किसी तरह के नशे की गिरफ्त में है. ग्रामीण क्षेत्रों से यह भी जानकारी सामने आयी है. आश्चर्य की बात है कि घर के कर्ताधर्ता को ही इस बात की जानकारी नहीं है.

पूरा किया गुटखा, शराब का शौक
बताया जा रहा है कि कोरोना काल में भी शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्र के युवा वर्ग ने किसी न किसी नशे का सहारा लिया. शहरी क्षेत्रों में गुटखा तो ग्रामीण क्षेत्रों में देशी शराब पीने वालों की संख्या आम दिनों की तुलना में लॉकडाउन के दिनों में ज्यादा रही. कोई बीड़ी पीता हुआ दिखायी दिया तो कोई किसी और नशे में गिरफ्त में दिखायी दिया. 

हर घर की एक ही कहानी
हर माता-पिता की यही इच्छा होती है कि उनकी संतान अच्छी शिक्षा ग्रहण कर इस काबिल हो जाए कि आगे चलकर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके. हर पिता अपने पुत्र से यही अपेक्षा रखता है कि उसे रोजगार मिल जाए ताकि वह अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन पोषण कर सके, लेकिन लगभग हर घर की कहानी यही है कि कोई ना कोई  व्यक्ति किसी न किसी नशे की गिरफ्त में है. 

बढ़ रही तादात
गुटखा, खर्रा खाने वालों की तादात लगातार बढ़ती जा रही है, उस पर कैसे काबू पाया जाए, इस समस्या का समाधान तो हर कोई चाह रहा है, लेकिन समाधान नहीं हो पा रहा है. पिछले कई वर्षो से गांव से स्नातक की डिग्री पाने वालों की संख्या में भारी कमी आयी है. शिक्षा शेरनी का दूध है, ऐसा कहा जरूर जाता है, पर इस बात को वास्तव में स्वीकार नहीं किया जा रहा.  

चौराहों पर रहते डटे
शिक्षा बीच में ही छोड़कर अधिकांश युवक चौक चौराहों पर मुंह में खर्रा दबाए डटे रहते हैं. प्रौढ़ तथा बुर्जुग भी दिखायी देते हैं. युवा पीढ़ी को इस नशीले संसार से कैसे मुक्ति दिलायी जाए, यही सबसे बड़ा सवाल है. भंडारा जिले के शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करने पर इस बात का खुलासा होता है कि 18-20 वर्ष की आयु वाले युवक गांजा, चरस जैसे नशों के आदि हो चुके हैं. गांवों के युवकों को व्यसन से मुक्ति कौन दिलाएगा यह सवाल बना हुआ है.