Jowar

भंडारा (का). जिले में प्राचीन काल में ज्वार का भरपूर उत्पादन होता था लेकिन वर्तमान में यह स्थिति है भंडारा जिले में ज्वार की खेती नहीं के बराबर होती है. कम उत्पादन होने से ज्वार का भाव गेहूं के मुकाबले बहुत ज्यादा है. ज्वार का भाव तेज होने के कारण उसकी रोटी भी अब महंगी हो गई है.

साधारण बोलचाल की भाषा में जिसे भाकरी रहते हैं, भी अब गरीबों का निवाला नहीं बन पा रही है. जिले के कुछ होटलों में ज्वार की भाकर की कीमत गेहूं की रोटी से ज्यादा है. एक भाकर के लिए ग्राहक को 15 रूपए चुकाने पड़ रहे हैं, जबकि गेहूं की रोटी के लिए पांच रूपए ग्राहक को देने पड़ रहे हैं.

जिले में पढ़ने के लिए पूर्व विदर्भ तथा महाराष्ट्र के मराठवाडा के विद्यार्थी शिक्षा ले रहे हैं. मराठवाडा के विद्यार्थी रोटी की तुलना भाकरी खाना ज्यादा पसंद करते हैं.

भंडारा जिले के विद्यार्थी भाकर की तुलना में रोटी खाना ही पसंद करते हैं. चूंकि धान भंडारा जिले की मुख्य फसल है, इसलिए यहां के विद्यार्थियों को चावल बहुत पसंद है. आज के दौड़भाग के जीवन में स्वास्थ्य के प्रति लोग ध्यान नहीं देते हैं. स्वास्थ्य के लिए अच्छी होने के बावजूद लोग भाकर न खाकर रोटी खाना ही पसंद करते हैं.

आहार की योग्यता को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक लोग आज भी हर दिन चपाटी की भाकर खाते हैं. वर्तमान में ज्वार की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसकी वजह से भाकर अब गरीब लोगों का निवाला नहीं बन पार ही है.

बाजार में 30 से 40 रूपए प्रतिकिलो की दर से बेची जा रही है, जबकि गेहूं का 20 से 25 रूपए प्रति किलो बिक रहा है, इसलिए किसी समय गरीबों का खाद्य पदार्थ कही जाने वाली भाकर अब अमीरों की थाली की शोभा बढ़ा रही है.