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    भंडारा. प्रकृति का कार्य निरंतर जारी रहने तथा पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना जैव विविधता का महत्वपूर्ण कार्य है. जंगल, खेत, वन, जीव के अस्तित्व पर ही मानव को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी जरूरतें पूरी की जाती हैं. बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते उद्योग- धंधे, परियोजनाओं के कारण बढ़ते प्रदूषण, वन्य जीवों के शिकार के कारण वन प्राणियों का जीवन खतरे में पड़ गया है. विश्व के पहले 12 देश में भारत की जैव विविधता की अपनी खास महत्ता है.

    देश में 90 हजार वन जीव-जंतु हैं. ढाई हजार मत्स्य प्रजाति तथा ढेढ़ सौ उभयचर प्राणी हैं. इस सृष्टि में घटकों की संख्या लोगों की उदासीनता के कारण बहुत तेज गति से कम हो रही है. वाघ की संख्या भी दिनोंदिन कम होती जा रही है. वाघ की घटती संख्या चिंता का विषय बना हुआ है. हिरन, नीलगाय, बंदर, सांबर आदि प्राणियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है.

    मानव के मन प्राणियों के बारे में जो अंधविश्वास फैला हुआ है, प्राणियों के बारे में जो अंधविश्वास फैला हुआ है, इस कारण पशु-पक्षियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है. मानव तथा पक्षु-पक्षियों के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ सभी की रक्षा करना जरूरी है. विकास के नाम पर वृक्षों की कटाई के कारण पक्षियों को अपना आशियाना बनाने में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है. ज्यादा गर्मी के कारण कम होते जल स्तर का असर भी वन प्राणियों को सहन करना पड़ रहा है.

    मानव की विकास यात्रा में प्रकृति तथा प्राणी दोनों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. मानव अपने विकास यात्रा में प्रकृति तथा प्राणियों को नुकसान पहुंचा रहा है, इस बात कि उन्हें जरा सा भी चिंता नहीं है, वह तो केवल अपनी ही चिंता कर रहा है. अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में जंगल तथा उसमें रहने वाले पक्षियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा.