Acharya Prafulla Chandra Ray of India, the father of hydroxychloroquine

कोरोनावायरस से जंग लड़ने में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन ने अहम भूमिका निभाई है. हालांकि यह दवा मलेरिया के लिए इस्तेमाल की जाती है. लेकिन कोरोना वायरस के मरीजों पर इसका उपयोग सफल साबीत हो रहा है. यही वजह है कि पूरे विश्व समेत अमेरिका भी इस दवाई की भारत से डिमांड कर रहा है.  मलेरिया के उपचार में काम आने वाली ये दवाइयों का भारत बड़ा उत्पादक है. कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए भारत ने इसके एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब देश में इस ड्रग को लाइसेंस्ड कैटेगरी में डाल दिया गया है. बीते दिनों महामारी की वजह से ट्रंप ने भारत को धमकी देते हुए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के एक्सपोर्ट पर से प्रतिबंध हटाने का दबाव भी डाला था. देश में क्लोरोक्वीन दवाई बनाने की सबसे बड़ी कंपनी बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड है. जिसकी स्थापना आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने की थी.

कौन थे प्रफुल्ल चंद्र?
प्रफुल्ल चंद्र का जन्म 2 अगस्त, 1861 को पूर्वी बंगाल के जैसोर जिले के राढुली गाँव में हुआ था. यह स्थान अब बांग्लादेश में है. उनके पिता का नाम हरिश्चंद्र और  माँ का नाम भुवनमोहिनी देवी था. प्रफुल्ल चंद्र को भारतीय रसायन शास्त्र का जनक माना जाता है. उन्होंने 1892 में 700 रुपए जैसी अल्प पूंजी की सहायता से एक लैब में बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड की स्थापना की. इस काम के पीछे उनकी सोच थी की वे बंगाल के युवाओं में  उदमीता की भावना पैदा कर सकें. वह एक बहुत ही भावुक और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. 

प्रफुल्ल चंद्र ने 1887 में एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से DSc की डिग्री प्राप्त करने के बाद, प्रेसीडेंसी कॉलेज में रसायन विज्ञान पढ़ाना शुरू किया. प्रफुल्ल चंद्र राय की प्राचीन ग्रंथों में बेहद रुचि थी. इसलिए 1902 और 1908 में उन्होंने दो भागों में अपनी रिसर्च “द हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री” को प्रकाशित किया. 

वर्ष 1916 में प्रफुल्ल चंद्र प्रेसिडेंट कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए. बाद में उन्होने कलकत्ता विश्व विद्यालय में 20 साल से भी ज्यादा सालों तक काम किया. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों और सम्मेलनों में कई भारतीय विश्वविद्यालयों का प्रितीविधित्व किया. उन्हें 1920 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुना गया.

वर्ष 1936 में 75 साल की आयु में प्रोफेसर एमेरिटस के पद से रिटायर हुए. जिसके बाद 16 जून 1944 को 82 साल की आयु में उनका निधन हो गया.

-मृणाल पाठक