Film writer KK Singh's sudden arrival in Bollywood

लखनऊ से आए हुए नौजवान कृष्ण कुमार उर्फ़ के के सिंह को राज कपूर ने फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के संवाद लेखन की ज़िम्मेदारी सौंप दी। के के सिंह के पास किसी फ़िल्म में संवाद लेखन का कोई अनुभव नहीं था। ये हैरत की बात इसलिए थी कि उन दिनों राज कपूर के यहां  हिंदी के चर्चित कथाकार और दूरदर्शन के प्रथम धारावाहिक ‘हम लोग’ के लेखक मनोहर श्याम जोशी का काफ़ी आना-जाना था।

राज कपूर बेहद पारखी कलाकार थे। जब पत्नी उम्मीद से थी तब आर्थिक मदद के लिए शैलेंद्र उनके पास गए। फ़िल्म ‘बरसात’ के सारे गीत लिखे जा चुके थे। शैलेंद्र ने किसी फ़िल्म में कभी कोई गीत नहीं लिखा था। मगर राज कपूर को उनकी प्रतिभा पर यक़ीन था। इसलिए हसरत जयपुरी के दो गीत हटाकर राज कपूर ने शैलेंद्र के दो गीत ‘बरसात’ में शामिल किए।

बी.ए. पास करके आंखों में फ़िल्म लेखन का सपना सजाए नौजवान के के सिंह जब लखनऊ से मुंबई पहुंचे तो राज कपूर फ़िल्म ‘प्रेम रोग’ की योजना बना रहे थे। निर्देशक तनुजा चंद्रा की मां कामना चंद्रा की लघु कहानी ‘प्रेम रोग’ किसी पत्रिका के चंद पृष्ठों पर प्रकाशित थी। राज कपूर के मार्गदर्शन में के के सिंह ने इसे फ़िल्म कथा के रूप में विकसित किया। फ़िल्म लेखक जैनेंद्र जैन ने इसकी पटकथा और संवाद लिखे।

सन् 1982 में प्रदर्शित ‘प्रेम रोग’ एक सुपर हिट फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में राज कपूर के सहायक बनकर के के सिंह ने  निर्देशन का हुनर भी सीखा। आगे चलकर के के सिंह ने सलमान ख़ान और दिव्या दत्ता अभिनीत फ़िल्म ‘वीरगति’ (1995) का निर्माण, निर्देशन एवं लेखन ख़ुद किया।

  • लखनऊ के पांच सितारा होटल में सम्वाद लेखन

फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ की पटकथा के के सिंह को सौंपते हुए राज कपूर ने कहा- तुम हिंदुस्तान के किसी भी शहर में, किसी भी हिल स्टेशन पर, किसी भी होटल में जहां तुम्हारी मर्ज़ी हो जाओ और संवाद लिखकर लाओ। के के सिंह ने अपने गृह नगर लखनऊ के पांच सितारा होटल क्लार्क्स अवध में जाने की ख़्वाहिश जताई। राज कपूर ने कमरा बुक करा दिया। होटल क्लार्क्स अवध में के के सिंह दो महीने तक राम तेरी गंगा मैली के संवाद लिखते रहे। काम पूरा करके वे मुंबई लौट आए।

अगले दिन शाम को आर के स्टूडियो में राज कपूर उनके सामने विराजमान थे। के के सिंह ने संवाद पढ़ना शुरू किया। राज कपूर झूले पर बैठ कर हाथ में जाम लिए चुपचाप सुनते रहे। के के सिंह ने दो ढाई घंटे में सारे संवाद पढ़ डाले। दोनों के दरमियान सन्नाटा पसर गया। पांच मिनट तक राज कपूर कुछ नहीं बोले। के के सिंह उनकी ख़ामोशी से डर गए। अचानक राज कपूर के होठों से एक वाक्य उछल पड़ा- “इसमें पहाड़ों की ख़ुशबू नहीं है।” के के सिंह ने झट से जवाब दिया “पहाड़ों के नाम पर मैंने सिर्फ़ खंडाला देखा है।” राज कपूर झूले से उतरे। बोले- घर जाओ।

  • कश्मीर में राज कपूर, के के सिंह, और रवींद्र जैन

सुबह दरवाज़े की घंटी बजी। एक आदमी ने के के सिंह को लिफाफा थमाया- इसमें एयर टिकट है। आपको दिल्ली होते हुए कश्मीर पहुंचना है। के के सिंह ने पूछा- और राज साहब? आदमी बोला- वे तो रात में ही चले गए। एक साधारण कोट पहनकर के के सिंह श्रीनगर पहुंचे। जब वे होटल की लॉबी में पहुंचे तो हाथ पैर ठंड से जैसे जम गए थे। मुंह से धुआं (वाष्प) निकल रहा था। राज कपूर ने उनके लिए गर्म कपड़ों का इंतज़ाम कराया।

कई दिन तक राज कपूर के साथ के के सिंह कश्मीर की वादियों में प्रकृति के अनुपम दृश्य देखते रहे। बीस दिन बाद अचानक संगीतकार रवींद्र जैन अवतरित हुए। राज कपूर के बुलावे पर वे यह उम्मीद लेकर आए थे कि कश्मीर में ‘राम तेरी गंगा मैली’ की म्यूज़िक सिटिंग होगी। तीन दिन तक राज साहब उन्हें घुमाते रहे। गीत संगीत की कोई बात नहीं की। चौथे दिन संगीतकार रवींद्र जैन बेक़ाबू हो गए। बोल पड़े- राज साहब म्यूज़िक सिटिंग कब शुरू करेंगे।

रवींद्र जैन उन दिनों रामानंद सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ का संगीत तैयार कर रहे थे। राज साहब ने “मंगल भवन अमंगल हारी” गाकर रविंद्र जैन की अद्भुत नकल पेश की। फिर हंसकर बोले- मेरी फ़िल्म के गीत संगीत पर इसकी परछाईं नज़र नहीं आनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि तुम रामायण की दुनिया से बाहर निकलो। कश्मीर की वादियों में घूमो और पहाड़ों की ख़ुशबू महसूस करो।

एक महीने बाद कश्मीर से वापसी हुई। के के सिंह ने खुली आंखों से और रवींद्र जैन ने बंद आंखों से पहाड़ों का हुस्न देखा। इस अनुभव और एहसास का करिश्मा ये था कि ‘राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म के संवादों में और गीत संगीत में शामिल पहाड़ों की ख़ुशबू को दर्शकों ने भी महसूस किया।

  • हमेशा औरत ही बांझ नहीं होती

फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ राज कपूर की आख़िरी फ़िल्म थी। फ़िल्म ‘हिना’ का सपना रणधीर कपूर ने पूरा किया। राज कपूर के साथ के के सिंह ने संवाद लेखन का हुनर सीखने के साथ ही शराब पीना और रातों में जागना सीखा। रात में जागना और दिन में सोना उनकी आदत बन गई। के के सिंह रोज़ शाम को अपनी कार में शाम की सैर के लिए निकलते थे। चेंबूर की गलियों में ड्राइवर धीरे-धीरे चक्कर लगाता रहता। कार की सीट पर बैठे बैठे के के सिंह वोदका का एक क्वार्टर ख़त्म कर लेते और घर लौट आते। इस तरह वे रोज़ अकेले अपनी शाम को आबाद करते थे।

राज कपूर के परिवार के साथ के के सिंह के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे। एक दिन आर के स्टूडियो में ऋषि कपूर से उनका सामना हो गया। ऋषि कपूर बोले- सिंह साहब, अच्छा हुआ आप मिल गए। मैंने सौ से ज़्यादा लेखकों की कहानियां सुनी। मुझे एक भी कहानी पसंद नहीं आई। आपसे मुझे एक कहानी चाहिए। के के सिंह मुंहफट थे। उन्होंने झट से जवाब दिया- अगर किसी दंपत्ति को बच्चा पैदा नहीं होता तो हमेशा औरत ही बांझ नहीं होती। मर्द भी नपुंसक हो सकता है। ऋषि कपूर बोले- आपकी बात मेरी समझ में नहीं आई। के के सिंह ने जवाब दिया – दो चार दिन सोचो, समझ में आ जाएगी।

  • के के सिंह को फ़िल्म फेयर अवार्ड

के के सिंह ने निर्देशक मेहुल कुमार की फ़िल्म ‘तिरंगा’ (1993) और ‘क्रांतिवीर’ (1994) को अपने रोचक संवादों से लोकप्रिय बनाया। ‘क्रांतिवीर’ के संवाद लेखन के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया। वे दोस्ती और बिजनेस को हमेशा अलग रखते थे एक फ़िल्म के संवाद लेखन के लिए उनका 10 लाख फिक्स रेट था। आधी रकम वे अग्रिम लेते थे। फाइनल स्क्रिप्ट के समय बकाया धनराशि लेकर ही स्क्रिप्ट देते थे।

निर्देशक मेहुल कुमार ने एक बार भुगतान के लिए टालमटोल किया। के के सिंह ने उनका चेक बैंक में डाल दिया। चेक बाउंस हो गया। के के सिंह ने लीगल नोटिस भेज कर मेहुल कुमार पर केस कर दिया। इस जुर्म में मेहुल कुमार को सज़ा हो गई। एक दिन उन्हें जेल में बिताना पड़ा। यह फ़िल्म जगत में मेहुल कुमार के अंजाम की इब्तदा थी। जहां तक मुझे याद है इसके बाद मेहुल कुमार ने तीन फ़िल्में घोषित की थीं मगर कोई रिलीज़ नहीं हुई।

  • फ़िल्म राइटर से फाइटर तक के के सिंह

के के सिंह बेहद ग़ुस्सैल इंसान थे। बिग बी की तरह उनकी आंखों में झट से लाली उतर आती थी। एक बार उन्होंने अंडरवर्ल्ड से जुड़े एक निर्माता की फ़िल्म लिखी। उसने बकाया राशि का भुगतान नहीं किया और स्क्रिप्ट मांगने लगा। के के सिंह ने फाइनल स्क्रिप्ट देने से से मना कर दिया। कहा- एक हाथ से पैसा दीजिए दूसरे हाथ से स्क्रिप्ट ले जाइए। उसने देख लेने की धमकी दी।

शाम को चेंबूर में के के सिंह के लेक व्यू बंगले के गेट पर चार पांच गुंडे दिखाई पड़े। के के सिंह बंदूक लेकर छत पर आ गए और गालियां देने लगे। उन्होंने गुंडों को ललकारा- जाकर अपने बाप से पूछो कि के के सिंह कौन है। दोबारा दिखाई पड़े तो उड़ा दूंगा। उनका उग्र रूप देखकर गुंडे डर गए और चले गए। अंडरवर्ल्ड से जुड़े निर्माता ने पता किया तो मालूम पड़ा कि के के सिंह बिहार के बाहुबली सूरजभान सिंह के मौसी के बेटे हैं। निर्माता ने उनसे माफ़ी मांगी। बकाया रकम देकर अपनी पटकथा ले गया।

  • मौत के आग़ोश में गीतकार कुलवंत जानी

सन् 2004 से 2008 तक मैं फ़िल्म राइटर एसोसिएशन की मैनेजिंग कमेटी का सदस्य था। हमारे एक सदस्य गीतकार अभिलाष ने अपने दोस्त गीतकार कुलवंत जानी से ब्याज पर क़र्ज़ लिया था। ब्याज की वसूली के लिए कुलवंत जानी उनके साथ पठानों जैसा सलूक करने लगे। गीतकार अभिलाष ने एसोसिएशन से प्राण रक्षा की लिखित अपील की। यह दो सदस्यों के बीच एक व्यक्तिगत मामला है या नहीं, यह तय करने के लिए डिस्प्यूट सेटेलमेंट कमेटी की बैठक में बतौर अतिथि के के सिंह को आमंत्रित किया गया। के के सिंह ने गीतकार अभिलाष के पक्ष में निर्णय सुनाया। गीतकार कुलवंत जानी के बर्ताव को लेखकीय गरिमा के प्रतिकूल बताते हुए के के सिंह ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की। कमेटी ने कुलवंत जानी को एसोसिएशन की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया। भारी भरकम काया वाले दबंग गीतकार कुलवंत जानी इस झटके को झेल नहीं सके। हृदयाघात हुआ और वे सीधे मौत के आग़ोश में चले गए।

  • निर्देशक महेश मांजरेकर की फ़िल्म पिता

के के सिंह ने निर्देशक महेश मांजरेकर की फ़िल्म ‘पिता’ (2002) के संवाद लिखे। संवाद लेखन की बकाया धनराशि देने से मांजरेकर ने मना कर दिया। जैसा कि के के सिंह ने मुझे बताया, अभिनेता संजय दत्त ने महेश मांजरेकर से कहा- “मेरे पास डायलॉग याद करने का टाइम नहीं है। तू मुझे सीन बता, मैं डायलॉग ख़ुद बोल देता हूं।” मांजरेकर का कहना था कि जब डायलॉग का उपयोग नहीं हो रहा है तो मैं भुगतान क्यों करूं।

के के सिंह ने फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन की डिस्प्यूट सेटेलमेंट कमेटी में मांजरेकर पर केस कर दिया। कमेटी ने के के सिंह के पक्ष में फ़ैसला दिया। मांजरेकर ने एसोसिएशन का फ़ैसला मानने से इंकार कर दिया। एसोसिएशन ने यह केस अपनी पैरंट बॉडी फ़िल्म फेडरेशन के पास भेज दिया। आनंद स्टूडियो में मांजरेकर के फ़िल्म की डबिंग चल रही थी। फेडरेशन के आदेश पर स्टूडियो के कर्मचारी काम छोड़कर बाहर निकल आए। डबिंग रुक गई। अंतत: महेश मांजरेकर ने बकाया धनराशि का भुगतान किया।

निर्देशक सुनील सुदर्शन की कई फ़िल्मों के संवाद के के सिंह ने लिखें। फ़िल्म ‘एक रिश्ता : दि बॉन्ड ऑफ लव’ उनकी सुपरहिट फ़िल्म थी। सन् 2004 में फ़िल्म राइटर एसोसिएशन के मुशायरे में मुझे सुनकर के के सिंह ने घर बुलाया। उन्होंने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि मैं सुनील दर्शन की फ़िल्म ‘बरसात : ए सब्लाइम लव स्टोरी’ में उन्हें असिस्ट करूं। मैंने मैंने उनका प्रस्ताव मान लिया। के के सिंह भगवान शिव के भक्त थे। अपनी इसी भक्ति के चलते उन्होंने नासिक के त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास एक फ्लैट ख़रीद रखा था। इसी फ्लैट में दस दिन रह कर हम लोगों ने फ़िल्म ‘बरसात’ का काम पूरा किया। सुनील दर्शन को जो फाइनल स्क्रिप्ट सौंपी गई वह मेरी हस्तलिपि में है।

  • जल्दी ऊपर चले गए के के सिंह

‘दोस्ती’ (2005), ‘मेरे जीवन साथी’ (2006) आदि फ़िल्में लिखने के बाद सन् 2011 में के के सिंह का हृदयाघात से आकस्मिक निधन हो गया। जहां तक मुझे याद है उनकी उम्र सिर्फ़ 57 साल थी। के के सिंह चपाती कभी-कभार खाते थे। चावल रोज़ खाते थे। गरमा गरम चावल में बड़ी चम्मच से चार पांच चम्मच देसी घी डालते थे। सब्ज़ी में भरपूर लाल मिर्च होती थी। वे सुबह 4:00 बजे के बाद सोते थे। रात भर समाचार, जुर्म और अपराध के सीरियल देखते थे। उनकी इस दिनचर्या ने उनका वज़न काफ़ी बढ़ा दिया था। मैंने कई बार खानपान के साइड इफेक्ट की तरफ़ उनका ध्यान दिलाया। वे हर बार हंस कर जवाब देते- यार ज़्यादा जी कर करेंगे क्या! परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं।

के के सिंह में संवाद लेखन का अद्भुत हुनर था। वे बंद आंखों से पूरी फ़िल्म देख लेते थे। इसके बाद वे धाराप्रवाह सम्वाद बोलना शुरू कर देते थे। पहले दृश्य से लेकर आखिरी दृश्य तक कोई काग़ज़ देखे बिना वे इस अंदाज़ में संवाद बोलते थे जैसे उन्हें अपनी फ़िल्म के सारे संवाद ज़बानी याद हों।

वे ऐसे स्वाभिमानी राइटर थे जो ज़रूरत पड़ने पर फाइटर की भूमिका में भी आ जाते थे। फ़िल्मी पार्टियों में उनकी कोई  दिलचस्पी नहीं थी। वे अपने घर की दुनिया में हमेशा मस्त रहे। उन्होंने कभी अपनी पब्लिसिटी पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने 25 साल के कैरियर में 25 फ़िल्में लिखकर शानदार पारी खेली। उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया। दीपक की लौ अगर ज़्यादा तेज़ हो तो उसके बुझने का ख़तरा भी अधिक होता है। ऐसा ही के के सिंह के साथ हुआ। वे बड़ी जल्दी ऊपर चले गए।

देवमणि पाण्डेय