Chandrashekhar Azad

फोटो में एक बोर्ड दिख रहा है, जिसमें दलित समाज से सम्बन्ध रखने वाली जाति चमार के लिए गाँव के इंट्री पवाइंट पर बोर्ड में लिखा है ” द ग्रेट चमार”। और, जो शख्स खड़ा है, वो है भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण, जिन्होंने कुछ महीनों पहले ‘आजाद समाज पार्टी’ नाम से एक राजनैतिक पार्टी भी बनाई है | ये महाशय आज के दलित युवाओं से कहते फिरते हैं कि वो अम्बेडकर को समझते हैं।

अम्बेडकर विचारधारा को समझते हैं और खुद को संविधान का रक्षक तक बताने से पीछे नहीं रहते। मैं उनसे पूछना चाहता हूं, कि अगर इस बोर्ड पर “द ग्रेट ब्राह्मण”, “द ग्रेट ठाकुर” “द ग्रेट बनिया”, “द ग्रेट जाट” या “द ग्रेट यादव” लिखा होता, तो उसको आप जातिवाद का परिचायक कह कर कैसे विरोध कर सकते हैं। जबकि, वो तो शुद्ध रूप से जातिवादी मानसिकता का ही परिचायक है।

“द ग्रेट चमार” का मतलब है कि इस जाति में पैदा होने से आदमी ग्रेट यानि महान हो गया। फिर, आपको वे महानता वाले काम भी बताने चाहिए। मेरी राय में तो सदियों तक जातीय नफ़रत और छुआछूत के दंश को झेलकर, और कुछ महापुरुषों की मेहनत से आज भी ये चमार जाति समानता के अधिकार पाने की लड़ाई ही लड़ रही है।

अम्बेडकरवादी बनो और युवाओं को भी बनाओ। लेकिन, युवाओं को जातिवादी मत बनाओ। इस आग में पता नहीं कितने घरों के युवा जवानी के जोश में बर्बाद हो जाएंगे। अगर सिखा सकते हो तो अम्बेडकर, फुले की विचारधारा सिखाओ, काशीराम का संघर्ष सिखाओ, वोट की कीमत सिखाओ, लोकतंत्र का मतलब सिखाओ, ताकि ये समाज अपने जायज सवाल उठाना सीखे। अपने आत्मसम्मान और हक की रक्षा करना सीखे। देश में जातिवाद सिखाना तो सबसे आसान काम है। वैसे भी देश में 5-6 साल की उम्र से ही जातिवाद सीखाना तो  पहले से ही जारी है।

दिलबाग सिंह, इनकम टैक्स अफ़सर और सामाजिक मामलों के आलोचक