नौकरी छोड़ मुफ्त में बांटने लगे हेलमेट, दोस्त की मौत के बाद शुरू की यह पहल

ट्रैफिक रूल्स के बारे में जानते तो वह सब लोग हैं, जो वाहन चलाते हैं। लेकिन उसको फॉलो बहुत कम लोग करते हैं। इन ट्रैफिक रूल्स में एक रूल यह भी है कि जब भी दो पहिया वाहन चलाएं तो हेलमेट लगाकर चलाएं। जो आपकी ज़िदगी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग इस नियम को भी फॉलो नहीं करते। कुछ लोग तो आपको ऐसे भी दिख जाएंगे जो पुलिस के डर से हेलमेट लगाते हैं और जैसे ही पुलिस की नज़र से दूर जाते हैं तो फिर हेलमेट निकालकर रख देते हैं। जोकि गलत और ट्रैफिक नियम के खिलाफ है। वहीं ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो खुद तो ट्रैफिक नियम का पालन करते ही हैं साथ ही दूसरों से भी करवाते हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ लोगों को हेलमेट की एहमियत बताई और मुफ्त में कई हेलमेट भी बांटे।  

हम बात कर रहे हैं राघवेंद्र कुमार की, जो बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गांव बगाढ़ी के रहने वाले हैं। यह किसी रियल लाइफ के सुपरहीरो से कम नहीं हैं। इन्हें अब ‘हेलमेट मैन’ से भी जाना जाता है। राघवेंद्र ने देशभर में अब तक 48 हज़ार से ज़्यादा हेलमेट मुफ्त में बांट चुके हैं। राघवेंद्र ने यह काम इसलिए शुरू किया क्यूंकि उन्होंने एक सड़क हादसे में अपनेबहा करीब इंसान को खो दिया था। इसलिए अब वह ये नहीं चाहतें कि किसी और का कोई करीबी उनसे दूर चला जाए। 

साल 2014 में राघवेंद्र ने एक बाइक हादसे में अपने जिगरी दोस्त को खाे दिया था। जिसके बाद उन्होंने यह ठान लिया था कि वह अब फ्री में लोगों को हेलमेट बांटने का काम शुरू करेंगे और उन्होंने ये किया भी। इसके पीछे का उद्देश्य यह है कि किसी और की बाइक हादसे से मौत न हो। 

गरीब परिवार से रखते हैं ताल्लुख-
राघवेंद्र एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वह बताते हैं कि उनके चार भाई है, जिसमें वह सबसे छोटे हैं। उनके पिता खेती-किसानी करके घर चलाते थे। वह स्कूल तो जाते थे, लेकिन 12वीं के बाद उनके मुश्किलें बढ़ गईं। क्यूंकि उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह राघवेंद्र को  आगे की पढ़ाई करवा सके। जिसके बाद राघवेंद्र ने वाराणसी जाने का निर्णय लिया। वहाँ जाकर उन्होंने 5 सालों तक कई छोटे-मोटी नौकरियां की और आगे की पढ़ाई के लिए पैसा जुटाया। 

हेलमेट न पहनने की वजह से दोस्त की गई जान-
राघवेंद्र बताते हैं जब वह वर्ष 2009 में लॉ की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली गए, तब वहां उनके बहुत सारे दोस्त बने। जिनमें से एक उनके प्रिय मित्र थे। उनका नाम था कृष्ण कुमार ठाकुर। राघवेंद्र बताते हैं कि कृष्ण इंजीनियरिंग कर रहे थे। उनका डिपार्टमेंट तो अलग था लेकिन वह हॉस्टल में साथ में ही रहते थे। फिर साल 2014 में उनके दोस्त का ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे पर एक्सीडेंट हो गया। जहाँ कृष्ण का सर फट गया और उनकी मौत हो गई। इस घटना ने राघवेंद्र को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।

इसपर राघवेंद्र बताते हैं कि जब अस्पताल में कृष्ण की मौत हो गई तब डॉक्टर की उनसे बात हुई। डॉक्टर ने उन्हें बताया कि अगर कृष्ण हेलमेट पहना होता, तो शायद वह बच जाता। इस बात ने राघवेंद्र को यह सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद उन्होंने यह फैसला लिया कि अपने उनके दोस्त की तरह किसी और की जान नहीं जाने देंगे। इसके बाद उन्होंने एक सड़क सुरक्षा अभियान की शुरुआत की, जिसके तहत वह किसी भी चौराहे पर खड़े होकर दोपहिया वाहन चालकों को नि:शुल्क हेलमेट बांटते थे। 

दोस्त की किताबें गरीब बच्चों में बाटी-
राघवेंद्र बताते हैं कि उनके दोस्त की मौत के बाद वह कृष्ण के माता-पिता से मिलने उनके घर गए। राघवेंद्र ने अपने साथ कृष्ण की कुछ पुराणी किताबें भी साथ लाए थे, जो उन्होंने एक गरीब बच्चे दे दिए थे। उसके बाद राघवेंद्र ने हेलमेट बांटने के काम शुरू कर दिया। फिर वर्ष 2017 में उन्हें एक कॉल आया, यह कॉल उस बच्चे की माँ का था, जिसे उन्होंने कृष्ण की किताबें दी थीं। उस बच्चे की माँ ने बताया कि राघवेंद्र की दी गई किताबों की मदद से उनका बेटा न सिर्फ ठीक से पढ़ सका, बल्कि उसने स्कूल में टॉप भी किया है। उस बच्चे की मां की बातें सुनकर राघवेंद्र को बहुत ख़ुशी हुई। 

एक नई पहल-

इस कॉल के बाद राघवेंद्र ने मन में एक और नया ख्याल आया। उन्होंने सोचा कि अगर हर ज़रूरतमंद बच्चे को समय पर किताबें मिलती रहें, तो एक बड़ा बदलाव होने की संभावना हो सकती है। जिसके बाद उन्होंने अपने इस विचार को एक बड़े अभियान का रूप दे दिया। साल 2017 में उन्होंने एक पहल की शुरुआत की। इस पहल में ऐसा था कि ‘जो भी व्यक्ति उन्हें पुराणी किताबें लाकर देगा वह बस उसी व्यक्ति को मुफ्त में हेलमेट देंगे।’

बुक डोनेशन बॉक्स-

राघवेंद्र बताते हैं कि जो किताबें उनके पास आती थी, वह उन किताबों को ज़रूरतमंद बच्चों में बांटा करते थे। जिसके बाद उनके इस मुहिम से स्कूल-कॉलेज के छात्र भी उनसे जुड़ने लगे हैं। इसके अलावा उन्होंने करीब 40 से ज़्यादा शहरों में ‘बुक डोनेशन बॉक्स’ भी लगाए है। जो कोई भी इन शहरों में उनकी मदद करना चाहता है, इन बॉक्स में किताबें डाल जाता है। आज राघवेंद्र के साथ अलग-अलग जगहों के 200 से भी ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं और इस मुहिम में उनका साथ दे रहे हैं। इसके ज़रिए वह अब तक 6 लाख बच्चों तक नि:शुल्क किताबें पहुंचा चुके हैं।

इस नेक काम के लिए नौकरी छोड़ी-
राघवेंद्र कहते हैं कि उनका यह सफर बहुत कठिनाइयों से भरा रहा है। इस नेक काम करने के लिए उन्हें अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ी थी। फिर कुछ समय बाद जब हेलमेट खरीदने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ी तो उन्‍होंने पहले अपनी वाइफ की ज्वैलरी और फिर अपना घर तक बेच दिया था।

मंत्री नितिन गडकरी ने की तारीफ-

उनके इस नेक काम की तारीफ केंद्रीय परिवहनमंत्री नितिन गडकरी ने भी की है। वहीं राघवेंद्र के इस निस्वार्थ काम से प्रभावित होकर बिहार सरकार ने उन्हें सम्मानित किया है और ‘हेलमेट मैन’ का टाइटल भी दिया है। इसके अलावा राघवेंद्र अपनी मुहिम को एक कदम आगे बढ़ाते हुए लोगों को हेलमेट के साथ 5 लाख रुपए का फ्री दुर्घटना बीमा भी देना शुरू किया है। जिसमें उनका साथ हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी उनकी मदद कर रही हैं।