वैलेंटाइन्स डे: Temporary वाला लव

चचा मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था.. ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे, एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। इन दिनों आग प्याज़ के भावों को लग सकती है लेकिन प्यार कौड़ियों के भाव बिक रहा है की अब लोग इसकी

चचा मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था..
ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,
एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है।

इन दिनों आग प्याज़ के भावों को लग सकती है लेकिन प्यार कौड़ियों के भाव बिक रहा है की अब लोग इसकी परिभाषा ही भूल गए हैं। हर गली मोहल्ले में प्यार के परिंदे मिल जाते हैं और ये निब्बा निब्बी उस दिन का इन्तेजार करते है जिसे कहते हैं ‘वैलेंटाइन्स डे’। इसका प्रचलन साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है और हमारे निब्बा निब्बी यानी कम उम्र के युवक-युवतियाँ इसमें लीन से होते जा रहे हैं। 

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असल मायनों में प्यार तो नहीं लेकिन गिफ्ट का इंतज़ार अब लगभग हर किसी को होता हैं। फिर चाहे छोटा सा Gift देख के अगले दिन Breakup ही क्यों न हो जाए। प्यार तो पहले भी होता था और जश्न भी होते थे लेकिन 14 फरवरी के दिन ऐसी अजब दीवानगी का मुजायेरा आज हर गली कूचे में होता है, जो पहले नहीं थी। वैसे अगर आप भी गिफ़्ट के बारे में सोच रहें हों तो हमनें थोड़ी मेहनत करके कुछ आईडिया निकाले हैं। 

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प्यार इस कदर सस्ता हो गया है कि हर किसी को कोड़ियों के भाव मिल रहा हैं और इतना मामूली भी की जब इच्छा हो तब ख़त्म सा हो जा रहा है। प्रेम के फैलते नशे को रोकने और असलियत से रूबरू कराने के लिए क्या प्यार के परिंदों की क्लास लेना जरुरी हो गया हैं। क्लास यानी मारकुटाई नहीं लेकिन प्यार के  मायने, उसका अहसास ऐसा कुछ। यह समझना जरूरी है की गुलाब हो या गुडहल प्यार से दिया हुआ फूल हर चीज़ से अनमोल होता हैं।  लेकिन साहब अगर आपने इज़हारे मोहब्बत गुलाब से नहीं किया तो लानत है आपकी मोहब्बत पर और लानत है ऐसी मोहब्बत पर जिसने देश की इकॉनमी में अपना योगदान नहीं दिया हो।

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ये प्यार वाली फीलिंग के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है हमारी फिल्में। और फिर गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के रामधीर सिंह ने तो कहा भी था "जब तक देश में सनीमा है लोग चु****** बनते रहेंगे।" अब अगर राहुल प्यार से प्यार करता है तो कबीर सिंह मारधाड़ से। अगर कुछ बच गया तो कुछ जोड़ों ने इसी दिन शादी भी कर ली….बताओं भला जब motivation ही यहाँ से मिलेगा तो फ्री के सपने देखने में लोग पीछे कैसे रह सकते हैं। खैर अब कर भी क्या सकते है…राहुल और कबीर तक तो ठीक है बस कपिल न बन जाए वरना समझ नहीं आएगा की किस- किस को प्यार करें।

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इतना सब होकर भी तो हमारे निब्बा निब्बियो का दिल नहीं मानता और फिर इनके प्यार में सोने पर सुहागा हमारी सेनाएँ कर देती है जो वैलेंटाइन्स डे के दिन हर गली को छान-टटोल लेती हैं। वैलेंटाइन्स डे मनाने की जल्दी भी उन्हें होती है और ब्रेकअप के बाद आशिकी दिखाने की होड़ भी रहती है इसलिए बड़े बुजुर्ग कहते है हमारी भी सुन लिया करो नहीं तो रोओगे और कहोगे 

तेरी हर रात से अच्छा मेरा दिन होगा 
तेरे जज्बात से अच्छा मेरा प्यार होगा 
अपनी महफिल से निकल के देखना ज़ालिम 
मेरा जनाज़ा तेरी बारात से अच्छा होगा….