छोटे उद्यमियों के सक्षम बनने पर ही बनेगा भारत ‘आत्मनिर्भर’

  • कोरोना संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित : विवेक तिवारी

मुंबई. माइक्रोफाइनेंस उद्योग की संस्था ‘एमफिन’ के बोर्ड मेम्बर विवेक तिवारी का कहना है कि माइक्रोफाइनेंस कंपनियां भारत के ग्रामीण क्षेत्रों एवं कस्बों में निम्न आय वर्ग के लोगों को स्थानीय स्तर पर स्वरोज़गार अर्थात अपना खुद का व्यवसाय लगाने के लिए तो प्रेरित कर ही रही हैं, साथ ही उन्हें आय सृजन के अवसर भी प्रदान कर रही हैं. माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं अपने वित्तीय और सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सदैव केंद्रित रही है और आगे भी अग्रसर रहेंगी. 

कोरोना वायरस के निरंतर फैलते हुए प्रकोप के कारण देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से क्षति पहुंची है और लॉकडाउन के दौरान सबसे ज़्यादा सूक्ष्म एवं लघु उद्यमी ही प्रभावित हुए है. निश्चित तौर पर बिना इनके आत्म निर्भर बने, ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना साकार नहीं हो सकता है. एमएसएमई मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2019 के अनुसार, एमएसएमई जगत में सूक्ष्म उद्यमों का वर्चस्व है. आज देश में 6.30 करोड़ सूक्ष्म उद्यमी है, जिनके कन्धों पर देश की 40 करोड़ से ज़्यादा आबादी का पेट भरने की ज़िम्मेदारी है. ये मजदूर हर रोज़ 12-15 घंटे मेहनत करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते है. निःसंदेह यह अपेक्षित है कि माइक्रोफाइनेंस हमेशा की तरह छोटे और मध्यम उद्यमों को समर्थन प्रदान करेगा, जो बदले में देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में करक सिद्ध होगा.

उद्यमियों ने अपना हौसला नहीं खोया

छोटे उद्यमियों का अपने उद्योगों की तरफ वापस लौटना, उन्हें फिर से खड़ा कर पाना अत्यंत सराहनीय है. इस लॉकडाउन के दौरान अनेक कठिनाइयों से जूझने के बावजूद भी इन उद्यमियों ने अपना हौसला नहीं खोया और धैर्यपूर्वक आगे बढ़ते रहे. निश्चित तौर पर यह महामारी अप्रत्याशित है, जिसका दुष्प्रभाव दुनिया के हर एक देश पर पड़ा है. जब भी ऐसी कोई बड़ी विपत्ति आती है तो फलस्वरूप उसका प्रभाव बड़े पैमाने पर महिलाओं, बच्चों, गरीबों या छोटे उद्यमियों पर ही पड़ता है. 

सूक्ष्म उद्यमियों को मदद दे बैंक

हालांकि पूरे समाज ने मिलकर एक जुटता के साथ इस संक्रामक वायरस से लड़ने की कोशिश की और इसमें सफलता भी मिल रही है. एक गहरी निराशा के माहौल में भी यह छोटे उद्यमी समाज की रीढ़ की हड्डी है और एक बार फिर से अपने रोज़गारों को खड़ा करने क लिए यह तत्पर हैं. ऐसे समय में बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा इन पर भरोसा करके सहयोग का हाथ आगे बढ़ाने से देश का एक बहुत बड़ा तबका धीरे-धीरे करके इस मुसीबत से बाहर आ जाएगा. बैंकों और वित्तीय संस्थानों को इन छोटे उद्यमियों के लिए आगे आना चाहिए और आसान शर्तों पर आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना चाहिए. जिससे कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना वास्तविक अर्थों में साकार किया जा सके. 

असामाजिक तत्वों के शिकार बनते छोटे उद्यमी

विवेक तिवारी ने कहा कि इन उद्यमियों की सरकार से बहुत अपेक्षाएं हैं. क्योंकि सरकारों की ज़िम्मेदारी है कि वह वित्तीय कंपनियों के लिए भी एक भरोसे का माहौल तैयार करें. जिसके कारण बैंक और वित्तीय संसथान ज़्यादा आसानी से इन उद्यमियों का सहयोग कर सके. प्राय: देखा गया है कि सूक्ष्म उद्यमी असामाजिक तत्वों के संकीर्ण चालों का शिकार बनते हैं. अमूमन, इन उद्यमियों की भावनाओं से खेला जाता है. लोन माफ़ी या खराब ऋण अनुशासन का उकसावा देकर यह असामाजिक तत्व उद्यमियों का क्रेडिट रिकॉर्ड खराब करवा देते हैं. जिसकी वजह से मजबूरी में ये उद्यमी बैंकों या वित्तीय संस्थानों से अपनी साख खो बैठते हैं. संकट की घड़ी में जो वित्तीय संस्थान इन उद्यमियों की तरफ़ अपना सहायता का हाथ बढ़ा कर सही अर्थों में इनके रोज़गारों को बढ़ाने में मदद कर सकतें हैं, उन्ही संस्थानों के खिलाफ इन्हें भड़काया जाता है और झूठे आश्वासन दिए जाते है. लोन माफ़ी के नाम पर छूठ-लूट का व्यवसाय किया जाता है और अंत में 50% से ज़्यादा छोटे रोगार सेठ-साहूकारों से मोटे ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं. साथ ही कुछ छुटभय्यै नेताओं के पिछलग्गू बनकर यह लोग अपना मेहनत से अर्जित किया हुआ सम्मान, स्वाभिमान और क्रेडिट रिकॉर्ड गवां बैठते हैं. 

दिया जाए वित्तीय अनुशासन और वित्तीय प्रशिक्षण

सामाजिक संस्थाओं तथा सरकार के साथ हम सबकी भी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है कि इस वर्ग को सही तरीके से वित्तीय अनुशासन और वित्तीय प्रशिक्षण दिया जाए. जिससे जो अराजक तत्व अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए लोगों को बेईमान बनाकर अपना क्रेडिट रिकॉर्ड खराब करने के लिए भड़काते हैं, जाने-अनजाने में साहूकारी को बढ़ावा देते हैं, उन्हें अपने मन्सूबों में किसी भी प्रकार से कामयाबी ना मिले. यह अनिवार्य है कि ऋण अनुशासन के महत्त्व और आवश्यकता को समझते हुए, वित्तीय संस्थानों के संचालन हेतु भरोसे का माहौल निर्मित किया जाए. यह अत्यावश्यक है कि ऐसे अराजक तत्वों को समय रहते नियंत्रित किया जाए और सरकार किसी भी प्रकार के संदेहवाद को उत्पन्न एवं प्रोत्साहित करने वालों के खिलाफ समय समय पर निश्चित तौर पर कठोर और वैध कार्यवाही करे. अब यह भी मूल रूप से स्पष्ट हो गया है कि बग़ैर औपचारिक वित्तीय संस्थानों के, ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना वास्तव में पूरा नहीं हो सकता है. इस सकारात्मक धारणा को अपनाने और प्रभावी उपायों को समय पर क्रियान्वित करने से ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को सही मायने में साकार किया जा सकेगा.