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    चंद्रपुर. जिले में पिछले 6 साल से जारी शराबबंदी हटाने का अंततः निर्णय मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया. इस निर्णय से अब जिले में अप्रैल 2015 से चल रही शराबबंदी हट गई है. शराबबंदी हटाने के इस निर्णय पर जिले में अलग अलग प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हुआ है. जिले की शराबबंदी हटने की अधिकृत घोषणा राज्य मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य तथा जिले के पालकमंत्री विजय वडेटटीवार ने मंत्रिमंडल की बैठक समाप्त होते ही पत्रकारों के समक्ष की.

    जिले में शराबबंदी लागू करने की मांग को लेकर पिछले कई वर्षों से चलाए जा रहे आंदोलन की पृष्ठभूमि पर तत्कालीन भाजपा-सेना गठबंधन के सरकार के कार्यकाल में एक अप्रैल 2015 से जिले में पूर्णतः शराबबंदी का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था. शराबबंदी लागू करने के लिए उन दिनों महिला संगठनों के साथ साथ श्रमिक एल्गार की पारोमिता गोस्वामी तथा जिले के तत्कालीन पालकमंत्री सुधीर मुनगंटीवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.

    सामने आ रहे थे दुष्परिणाम

    जिले में शराबबंदी लागू किये जाने के एक वर्ष बाद ही इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे थे. शराबबंदी लागू करने का उस वक्त का लिया गया निर्णय देवतले समिति की रिपोर्ट के आधार पर  लिया तो गया था किंतु समिति द्वारा शराबबंदी पर शतप्रतिशत अमल के लिए सुझाये गए तमाम सुझाव तथा उपायों को कार्यान्वित करने में तत्कालीन सरकार पूर्णतः विफल रही थी, परिणामस्वरूप जिले पूर्णतः शराबबंदी के शतप्रतिशत अमल पर सरकार और जिला प्रशासन विफल साबित होती गयी थी. 

    शराबबंदी के बावजूद जिले में धड़ल्ले से शराब पहुंच रही थी, जिले में दाखिल होने वाली इस शराब में अधिकांश शराब जाली और नकली थी , चोरी छिपे लायी जाने वाली इस शराब से लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर दिखने लगा था, जिले में शराब तस्करों का जाल बढ़ने लगा था, 4 गुना दामों पर बेची जाने वाली इस शराब से लोगों की आर्थिक लूट हो रही थी. शराब तस्करी में लिप्त आपराधिक किस्म के लोग चंद माह में ही मालामाल हो रहे थे.

    अवैध शराब के कारोबार से तत्काल मिल रही आमदनी के लालच में जिले में शराब तस्करों के बीच जंग भी छिड़ने लगी थी जिससे जिले में मारपीट, हत्या जैसी घटनाओं में निरन्तर वृद्धि देखी जा रही थी. इस अवैध कारोबार को सुचारू रखने हेतु जिले में अवैध रूप से हथियारों का साम्राज्य भी फैलने लगा था. अवैध शराब के साथ साथ जिले में प्रतिबंधित ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री बढ़ने लगी थी और इसका विपरीत असर स्कूली तथा महाविद्यालयीन छात्रों पर पड़ने लगा था.

    शराबबंदी के जिले में हो रहे इस विपरीत परिणामों के मदद्देनजर जिले से शराबबंदी हटाने की मांग पिछले 3 वर्ष से शुरू हो गयी थी. शराबबंदी के जिले में सामने आ रहे दुष्परिणामों की समीक्षा हेतु सरकार ने अंततः 12 जनवरी 2021 को सेवानिवृत्त प्रधान सचिव रमानाथ झा के नेतृत्व में 13 सदस्यों की उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था जिसमें आबकारी विभाग के उपायुक्त मोहन वरदे,  अधि. प्रकाश सपाटे, अधि. वामनराव लोहे, गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति कीर्तिवर्धन दीक्षित, प्रदीप मिश्रा, संजय तायड़े, अधि जयंत सालवे, सामाजिक कार्यकर्ता बेबी उइके, जिला पुलिस अधीक्षक, जिला शाल्य चिकित्सक,  जिला समाज कल्याण अधिकारी, तथा जिला महिला एवंम बाल कल्याण अधिकारी आदि का समावेश था.

    इस समिति ने 45 दिनों में कुल 11 बैठकों के जरिये अपना कार्य करते हुए 9 मार्च को अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश की थी. इस रिपोर्ट में समिति ने जिले में चल रही शराबबंदी के हो रहे परिणामों की विस्तृत समीक्षा की थी. अपनी रिपोर्ट में समिति ने जिले में शराबबंदी के सकारात्मक परिणामों की बजाय नकारात्मक परिणाम ही ज्यादा नजर आने की विश्रुत रिपोर्ट सरकार को पेश की थी. इसके लिए समिति ने पुलिस, आबकारी, स्वास्थ्य, समाज कल्याण, महिला व बाल विकास विभागों से पिछले 5 वर्ष के विस्तृत आंकड़े जमा करते हुए उसका विश्लेषण किया था.

    अपनी रिपोर्ट में समिति ने जिले में शराबबंदी के सकारात्मक परिणामों पर नकारात्मक परिणाम हावी होने, शराबबंदी के अमल में प्रशासन विफल होने, देवतले समिति की सिफारिशों पर अमल करने में तत्कालीन सरकार पूर्णतः असफल होने की बात स्पष्ट करते हुए जिले की शराबबंदी पर राज्य सरकार द्वारा यथोचित निर्णय लेने की सिफारिश की थी.