Borwell
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    5,540 बोरवेल शहर में

    • – अकेले शहर में 5,540 बोरवेल हैं. इनमें से अधिकांश लोगों ने तो बिना अनुमति के ही घरों में खोद डाले हैं. 
    • – परकोटे के भीतर से लेकर परकोटे के बाहर लोगों ने बड़ी-बड़ी बिल्डिंग खड़ी की है, जिनमें बोरवेल खोदकर पानी की व्यवस्था की गई है.
    • – परकोटे के भीतर तो नल योजना से जलापूर्ति होती है. किंतु शहर से दूर-दूर बसी बस्तियों में बोरवेल की जलापूर्ति ही एकमात्र सहारा है.
    • – जिस तरह से भूजल गिरता जा रहा है. उससे भविष्य में भूगर्भ से पानी मिलना कठिन हो जाएगा.

     

    चंद्रपुर. शहर की आबादी इस समय करीब 3.45 लाख हैं. मनपा सीमा का विस्तार होने पर शहर की आबादी लगभग 6 लाख होने की संभावना है. किंतु हालात ऐसे बनते जा रहे हैं इतनी बड़ी आबादी को भविष्य में भीषण जलसंकट का सामना करना पड़ सकता है. शहर में भूगर्भ का जलस्तर दिन-ब-दिन नीचे गिरता जा रहा है. स्थिति यह है कि 300 फीट बोर करने पर भी पानी नहीं मिल रहा है.

    शहर की आधी आबादी प्यासी

    शहर की आधी जनता ईरई नदी पर बने बांध से होने वाली जलापूर्ति पर निर्भर है. अमृत कलश योजना के चलते शहरवासियों को भविष्य में नल योजना से जलापूर्ति होगी. लेकिन अब भी शहर का आधा इलाका ऐसा है, जहां अब भी बोरवेल का पानी इस्तेमाल होता है. लोगों ने बोरवेल खोद रखी है. किंतु ग्रीष्मकाल में तो इनमें से केवल हवा ही निकलती है. पानी का अतापता नहीं होता. जुलाई में भी पानी आ जाता था, लेकिन अब भी कई बोरवेल प्यासी हैं. जानकार इसे भविष्य में भीषण जलसंकट के संकेत मान रहे हैं.

    तालाबों का मिट चुका अस्तित्व

    एक समय था जब शहर में 15 से 20 फीट पर पानी लग जाता था. गोंडकालीन शासकों के समय शहर में ही भूजल के लिए एक नहीं, बल्कि कई तालाब बना रखे थे. जिनमें से कोहीनूर, गौरी, तुकूम, घुटकाला तालाब से लेकर लगभग सभी तालाब सूख गए और अतिक्रमण के चलते तालाबों का नामोनिशान मिट चुका है.

    एकमात्र रामाला तालाब सुरक्षित था, परंतु अब यह भी नष्ट होने की कगार पर है. भूमिगत कोयला खदानों के कारण भूजल का स्तर दिन-ब-दिन गिरते जाने के कारण अब स्थिति है कि 300-350 फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं लग पा रहा है. पूरे शहर में क्रांकीट का जंगल फैला हुआ है. बारिश का पानी भी भूगर्भ में जाने के बजाय नालों और नालियों के जरिए नदी में जाकर समा जाता है.

    मनमर्जी से खोदी गई

    एक समय था जब शहर की आबादी केवल परकोटे और उसके बाहर कुछ ही दायरे में स्थित थी. लेकिन अब स्थिति है कि ईरई, वर्धा नदी के मुहाने तक बस्तियां बस चुकी हैं. नागपुर रोड पर वड़गांव से लेकर आगे तक नई बस्तियां बस गई हैं. मूल रोड, बल्लारपुर रोड, पठानपुरा गेट से बाहर दूर-दूर तक नई कालोनियों का विकास हुआ है.

    नए चंद्रपुर का तेजी से विकास हो रहा है. जहां म्हाडा कालोनी से लेकर दूर-दूर तक नई कालोनियां बसी हुई हैं. नई बस्तियों में पेयजल आपूर्ति के लिए नल योजना नहीं पहुंच पाई है. इसलिए जलापूर्ति के लिए लोगों ने बोरवेल खोद रखी है. बोरवेल खोदने के लिए महानगर पालिका एवं भूजल सर्वेक्षण विभाग की अनुमति लेने होती है, परंतु किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया और अपनी मनमर्जी से बोरवेल खोद दी है.

    रेनवाटर हार्वेस्टिंग के प्रति उदासीनता

    नई-नई कालोनियों और बस्तियों का विस्तार तो हुआ है. किंतु चंद मकानों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश के यहां रेनवाटर हार्वेस्टिंग के लिए कोई सुविधा नहीं है. हालांकि मनपा ने लोगों को रेनवाटर हार्वेस्टिंग के लिए काफी प्रेरित करने का काम किया है. इसमें मनपा के टैक्स में छूट के साथ वेकोलि की सहायता से रेनवाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था करने वालों को आर्थिक मदद भी की जा रही है. इसके बावजूद सभी उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं.

    बारिश का पानी भूगर्भ में नहीं पहुंच पाएगा, तो आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम सभी को भुगतने पड़ सकते हैं. वर्धा, ईरई नदी पर निर्भरता किसी ग्रीष्मकाल में सूखा पड़ने पर समूचे चंद्रपुरवासियों के लिए पानी के लिए हाहाकार मचा सकती है. इस पर मनपा और जिला प्रशासन को गंभीरता दिखाते हुए उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है.