Naxal-Chhattisgarh

    नई दिल्ली: कई वर्षों से अक्सर देखा जाता है कि मार्च (March) महीने में नक्सली (Naxalite) हमले और उनकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं। अभी हाल में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर (Dantewada, Sukma and Bijapur of Chhattisgarh) में 175 से ज्यादा सुरक्षाबलों (Security Forces) के जवान शहीद हो चुके हैं। अगर पिछले 10 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक केवल छत्तीसगढ़ में 489 जवान शहीद हो चुके हैं। इन दस सालों में इस क्षेत्र और यहां तैनात जवानों ने 3000 से अधिक नक्सली हमलों का सामना किया है। ताजा मामला शनिवार का है जहां बीजापुर में 22 जवान शहीद हुए हैं।

    यदि आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो नक्सलियों के हमले का एक निर्धारित पैटर्न है। देखा गया है कि छत्तीसगढ़ में ज्यादातर नक्सली हमले मार्च और जुलाई महीनों के बीच होते हैं। इसका एक कारण है कि नक्सली फरवरी से जून माह के बीच बड़ी योजनाएं बनाते हैं और मानसून से पहले उसे अंजाम देते हैं।

    यहां सेवा दे रहे सुरक्षाबलों के जवानों के लिए अपने ऑपरेशन्स को देने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और इसका सबसे बड़ा कारण है दूर दराज जंगल का इलाका। इन दिक्कतों का एक अन्य कारण है सरकारी अधिकारियों की अनदेखी और राजनीतिक इच्छा की कमी।

    इसी वजह से इन इलाकों में नक्सल मजबूत हो रहा है। उदाहरण के तौर पर आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य जहां नक्सल हैं, वो इस वजह से क्योंकि यह  इलाके जंगल से सटे हुए हैं और नक्सली हमले के बाद आसानी से यह बॉर्डर पार कर सकते हैं।

    एक पूर्व सीआरपीएफ के डीजी ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत के दौरान बताया कि सड़कों का ना होना, संपर्क के कम माध्यम, नक्सलियों को इन जंगली इलाकों में और अधिक मजबूत और सफल बनाते हैं। इसके अलावा एक बड़ा कारण है राज्य का नक्सल को खत्म करने में कितना सहयोग है।

    सीआरपीएफ अधिकारियों का कहना है कि, सलवा-जुडूम अभियान ने भी नुकसान पहुंचाया। इस अभियान ने गांव को दो भागों में बांट दिया जिन इलाकों में अभियान शुरू हुआ वह सुरक्षाबलों के साथ रह गए जबकि दूसरी ओर के लोगों को छोड़ दिया गया।

    समय के साथ माओवादियों ने खुद को इन इलाकों में और ताकतवर बनाया एवं जहां ट्राइबल लोग रहते हैं उन इलाकों को टारगेट किया। आसपास के राज्यों में ऐसे कई ठिकाने बनाए जहां उन्हें ज्यादा सुरक्षा मिलती है।