45 वर्षों के बाद अब इमरजेंसी को असंवैधानिक करार देने की मांग क्यों?

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचलने के लिए 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से आपातकाल (Emergency) लगाया था जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद (Fakhruddin Ali Ahmed) ने हस्ताक्षर किए थे. उस समय तानाशाही जैसी स्थिति थी. सारे विपक्षी नेताओं के अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रह चुके चेहरों को भी जेल में डाला गया. उनमें मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर जैसे पूर्व कांग्रेसी नेताओं का समावेश था. जनसंघी और समाजवादी नेताओं तथा आरएसएस से जुड़े लोग कारावास में ठूंस दिए गए थे.

इमरजेंसी देश के राजनीतिक इतिहास का काला अध्याय था जिसमें संविधान में दी गई अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया गया था. व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई थी. मीडिया पर सेंसरशिप थी. सभा करने, जुलूस निकालने, नारे लगाने, सरकारी नीतियों व कदमों की आलोचना करते हुए लिखने-बोलने पर सख्त पाबंदी थी. दमनचक्र अपने चरम पर था. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को इंदिरा सरकार ने सख्ती से कुचला था. आज की नई पीढ़ी को इमरजेंसी की उतनी जानकारी नहीं है, जिसे स्वयं इंदिरा गांधी की सरकार ने मार्च 1977 को हटाकर नए चुनाव के लिए रास्ता खुला कर दिया था.

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगनमोहन लाल सिन्हा (Judge Jagmohan Lal Sinha) ने इंदिरा गांधी के रायबरेली से चुनाव को अवैध करार दिया था और उनके प्रतिद्वंद्वी समाजवादी नेता राजनारायण की जीत पर मुहर लगाई थी. इससे इंदिरा का अप्रसन्न होना स्वाभाविक था. इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के हाथों में सारी शक्तियां आ गई थीं. तब सरकार व प्रशासन का रवैया काफी सख्त था. लोकतंत्र कुचल दिया गया था. पुलिस और अधिकारियों ने मौके का गलत फायदा उठाकर मनमाने अत्याचार किए जिसकी कोई सुनवाई नहीं थी. तब न्यायपालिका भी भारी दबाव में थी. 4 दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी भुक्तभोगियों के घाव भरे नहीं हैं. कटु स्मृतियां उन्हें रह-रह कर कचोटती हैं. वे चाहते हैं कि भविष्य में कभी भी आपातकाल लागू होने की नौबत न आने पाए. इसीलिए 94 वर्षीय महिला वीरा सरीन (Veena Sarin) ने अब आपातकाल को असंवैधानिक घोषित करने की मांग को लेकर याचिका दायर की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है.

कोर्ट ने कहा कि देखना होगा कि 45 वर्ष बाद ऐसा किया जा सकता है या नहीं! वीरा सरीन के कीमती रत्नों का व्यापार करने वाले पति को इमरजेंसी के दौरान अवैध तरीके से गिरफ्तार कर स्मगलिंग से जुड़ी धाराएं लगाकर देश छोड़कर चले जाने पर विवश किया गया था और उनकी दूकान के सभी रत्नों को तत्कालीन सरकार के लोगों ने हड़प लिया था. इसके लिए याचिकाकर्ता ने 25 करोड़ रुपए हर्जाना दिलाने की मांग भी की है. यहां प्रश्न यह भी उठता है कि इतने वर्षों में वीरा सरीन ने ऐसी याचिका क्यों नहीं दायर की? क्या यह कालबाह्य नहीं है? इसके अलावा इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यदि उनकी याचिका पर अनुकूल फैसला हुआ तो संविधान से इमरजेंसी का प्रावधान पूरी तरह निकालना पड़ेगा, जिसके लिए संसद को संविधान संशोधन करना पड़ेगा. इमरजेंसी से पीड़ित अन्य कितने ही लोग इतने वर्षों बाद हरजाना मांगने लगेंगे, तब क्या होगा?