देश की भलाई के लिए समान नागरी कानून की आवश्यकता

    दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायाधीश प्रतिभा सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 44 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरी कानून) की जरूरत है. उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि अनुच्छेद 44 सुप्तावस्था में पड़ा हुआ है और इतने दशकों में इसे लागू करने की दिशा में कदम नहीं उठाया गया. ऐसे समय, जब कुछ लोग निहित स्वार्थवश अपने व्यक्तिगत कानूनों से चिपके हुए हैं, तब यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात करना एक उपयुक्त बदलाव की ओर इंगित करता है. बीजेपी ने धारा 370 हटाने, राम मंदिर बनवाने और समान नागरी कानून का वादा किया था. इनमें से 2 वादे पूरे किए गए, केवल यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसला बाकी है.

    मोदी सरकार इसे लागू करने के बारे में अनुकूल रवैया रखती है, इसलिए इसे लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है. समान नागरी कानून लागू होने पर सभी भारतीयों के लिए संपत्ति के स्वामित्व, उत्तराधिकार, विवाह, तलाक के लिए एक जैसे नियम-कानून रहेंगे तथा यह सारे मसले आसानी से सुलझेंगे. आधुनिक भारतीय समाज में लोगों का नजरिया व्यापक होता जा रहा है. देश की एकता के लिए भी यूनिफॉर्म सिविल कोड आवश्यक है. यह ऐसा कानून होगा जो धार्मिक व सामाजिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं होगा और सभी पर समान रूप से लागू होगा.

    जब कोई भी बदलाव आता है तो किसी वर्ग की ओर से उसका विरोध होता ही है. जब सरकार ने तीन तलाक विरोधी कानून बनाया तो मुस्लिम महिलाओं ने उसका स्वागत किया, लेकिन कुछ कट्टर लोगों ने इसका विरोध किया था. मुस्लिम महिलाओं को इससे बहुत राहत मिली क्योंकि शौहर 3 बार तलाक बोलकर अपनी बीवी को बेघर व बेसहारा कर देता था. देश के बड़े वर्ग, यहां तक कि मुस्लिमों के भी सहयोग से यह कानून संसद में पारित हो गया था. इसी आधार पर यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) कानून भी बनाया और लागू किया जा सकता है. इसके लिए उपयुक्त माहौल बनाकर निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है.