राज्यपाल के नाम पर खानापूरी, कश्मीर, महाराष्ट्र, बंगाल छोड़ अन्य सभी प्रभावहीन

    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक साथ 8 राज्यपालों की नियुक्ति की. इनमें से कितने ही ऐसे चेहरे हैं जिन्हें लोग नहीं जानते. इनमें 4 गवर्नर नए हैं और 4 का तबादला किया गया है. यह एक तरह की खानापूरी है. बुजुर्ग नेताओं को सक्रिय राजनीति से हटाने और विश्राम देने के लिए राजभवन भेज देने से बढ़िया विकल्प कोई हो नहीं सकता. राज्यपाल के काम भी काफी मर्यादित होते हैं, जैसे- राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में विधान मंडल सत्र की शुरुआत में अभिभाषण देना, मंत्रियों को शपथ दिलाना, विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर कर कानून का रूप देना या पुनर्विचार के लिए भेजना, राजभवन में अतिथियों का स्वागत करना व राष्ट्रीय दिवसों पर परेड की सलामी लेना. 

    इसके अलावा केंद्र का प्रतिनिधि होने के नाते राज्यपाल राज्य की राजनीतिक गतिविधियों की रिपोर्ट केंद्र को भेजा करता है. राज्यपाल की भूमिका उस राज्य में अहम हो जाती है जहां विपक्षी पार्टी की सरकार है. ऐसे राज्य में आमतौर पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच अनबन देखी जाती है. वहां की सरकार राज्यपाल के रवैये से असंतुष्ट बनी रहती है. कश्मीर में सत्यपाल मलिक के हटने के बाद मनोज सिन्हा को राज्यपाल बनाया गया. ऐसे समय, जब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों का परिसीमन और चुनाव कराने की तैयारी है और इसे पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाना है, तब राज्यपाल की भूमिका प्रभावी हो जाती है. 

    बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. वहां केंद्र के राजनीतिक उद्देश्यों को देखते हुए राज्यपाल की भूमिका उल्लेखनीय हो जाती है. केंद्र राज्यपाल से कानून-व्यवस्था भंग हो जाने की रिपोर्ट मंगवाकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है. महाराष्ट्र में राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी और उद्धव ठाकरे की सरकार के बीच तनातनी है. कंगना रनौत की राज्यपाल से भेंट को लेकर बवाल मचा था. राज्यपाल ने विधान परिषद के लिए सिफारिश किए गए 12 नामों को कई महीने बीत जाने पर भी मंजूरी नहीं दी. राज्यपाल के आलोचक उन्हें बीजेपी का एजेंट तक कहते हैं.