कश्मीर के नेता मजबूरी में साथ-साथ

जब जम्मू-कश्मीर (Jammu & Kashmir) के विभिन्न पार्टियों के नेताओं के ध्यान में यह बात आ गई कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता तो वे अपने मतभेदों के बावजूद जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव लड़ने के लिए तालमेल करने पर मजबूर हो गए. इन पार्टियों की राजनीति को केंद्र की मोदी सरकार के सख्त कदमों ने बुरी तरह झकझोर दिया. जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 तथा 35(ए) (Article 370 and 35) (A)की समाप्ति से इन पार्टियों को करारा झटका लगा जो अलगाववाद के रास्ते पर लंबे समय से चल रही थीं और कश्मीरियत के नाम पर राष्ट्रीयता को चुनौती दे रही थीं.

चाहे नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी, उनके शासन में कश्मीर में आतंक और अलगाव को भरपूर बढ़ावा मिला. ये पार्टियां केंद्र पर दबाव डालकर अपनी मांगें मनवाती रहीं. खासतौर पर कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान इन पार्टियों और उनके नेताओं को अभयदान मिला हुआ था. इसके काफी पहले भी जब वीपी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार केंद्र की सत्ता में आई थी तब केंद्रीय गृहमंत्री बनाए गए पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आतंकियों से साठगांठ कर अपनी बड़ी बेटी रूबिया सईद का कथित ‘अपहरण नाटक’ करवाया था. रूबिया की रिहाई के एवज में मकबूल बट जैसे कुख्यात आतंकवादी रिहा किए गए थे. केंद्र की ओर से जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए मोटी रकम दी जाती रही. इस पैसे से ये कश्मीरी नेता ऐश करते रहे जबकि जनता बेहाल बनी रही. फारूक अब्दुल्ला (Farooq Abdullah) और महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) की बयानबाजी कुछ ऐसी थी मानो वे भारत में रहकर देश पर अहसान कर रहे हैं. फारूक ने अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए चीन की मदद लेने की बात भी कही थी. अलगाववादी और पाकिस्तान-परस्त ताकतों को इनका समर्थन बना हुआ था. इन नेताओं के सत्ता में रहते सुरक्षा बलों पर पथराव तथा अलगाववादी नारेबाजी को बढ़ावा मिलता रहा.

जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बनाने और इन नेताओं को हिरासत में लिए जाने के बाद वहां की स्थिति में बदलाव आया है और केंद्र ने विकास योजनाएं तेज कर दी हैं. इतने पर भी सरपंचों पर आतंकी हमले जारी हैं. अब कश्मीर की 7 पार्टियों ने, जिनमें फारूक व महबूबा की पार्टियां तथा लेफ्ट भी शामिल हैं, मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इनके गठबंधन को ‘पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन’ ‘(People’s Alliance for secret declaration) ‘नाम दिया गया है. ये सारी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ एकजुट हैं. इनके अलावा जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस ने भी चुनाव लड़ने का एलान किया है. खास बात यह है कि नेशनल कांफ्रेंस के नेता व पूर्व मंत्री आगा रुहुल्लाह मेंहदी ने चुनाव लड़ने के पीएजीडी के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि यह मुख्यधारा के नेताओं के चुनाव में शामिल होने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बिछाया गया जाल है.