मराठी फिर अनिवार्य होना अच्छा कदम

जो व्यक्ति जिस प्रदेश में रहता है, उसे वहां की भाषा आनी ही चाहिए. इसके बिना उस प्रदेश से लगाव नहीं हो सकता. क्षेत्र की भाषा जानने से वहां के लोगों से संवाद संभव हो पाता है और साथ ही वहां के साहित्य,

जो व्यक्ति जिस प्रदेश में रहता है, उसे वहां की भाषा आनी ही चाहिए. इसके बिना उस प्रदेश से लगाव नहीं हो सकता. क्षेत्र की भाषा जानने से वहां के लोगों से संवाद संभव हो पाता है और साथ ही वहां के साहित्य, संस्कृति का भी बोध होता है. इससे अलगाव मिटता है और समरसता स्थापित होती है. जब द्विभाषी मुंबई राज्य का निर्माण हुआ था तब 1958 से 1960 तक स्कूलों में मराठी पढ़ाना अनिवार्य था. नागपुर से राजधानी भोपाल चले जाने के बाद विदर्भ की स्कूलों में बच्चों को मराठी बालभारती पढ़ाई जाती थी. 1 मई 1960 को महाराष्ट्र राज्य का निर्माण हुआ. मराठी के महत्व व गरिमा का ध्यान रखते हुए एक सार्थक पहल के तहत विधान परिषद में मंत्री सुभाष देसाई ने विधेयक पेश किया, जिस पर चर्चा के बाद सभी सदस्यों ने इसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया. इस विधेयक में सभी भाषा व बोर्ड के स्कूलों में कक्षा 1 से 10वीं तक मराठी भाषा को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का प्रावधान है. इस कानून को 2020-21 के शिक्षासत्र से महाराष्ट्र के सभी स्कूलों में लागू कर दिया जाएगा. इस कानून का पालन नहीं करने वाले स्कूलों पर 1 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है. देखा गया है कि आप्शनल होने पर कितने ही विद्यार्थी मराठी की बजाय संस्कृत ले लेते हैं. इसकी वजह यह है कि मराठी का पेपर कितना भी अच्छा करो, उसमें 70-75 अंक ही मिट जाते हैं जबकि संस्कृत में गणित के समान शत प्रतिशत नंबर मिलते हैं. सीबीएसई स्कूलों में मराठी की बाध्यता नहीं थी लेकिन अब वहां भी मराठी पढ़नी पड़ेगी. मराठी पढ़ने से छात्रों के मन में महाराष्ट्र की संस्कृति, यहां के गौरवशाली इतिहास, उत्कृष्ट साहित्य, संतों की रचनाएं पढ़ने के प्रति लगाव उत्पन्न होगा. हिंदी से प्रभावित विदर्भ के नागपुर, गोंदिया के छात्र भी पश्चिम महाराष्ट्र के पुणे, दक्षिण महाराष्ट्र के कोल्हापुर के प्रति अपनापन महसूस करेंगे. मराठी जानने से सामंजस्य बढ़ेगा. यूरोप में लोग अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच और जर्मनी सीखते हैं. अमेरिका में भी अंग्रेजी के साथ स्पैनिश पढ़ाई जाती है. बहुभाषी होना तो हमेशा लाभप्रद रहता है. महाराष्ट्र में राज्यभाषा मराठी को फिर अनिवार्य करना अच्छा व स्वागत योग्य कदम है.