सरकारी आवास में ओवर स्टे, जब नेता बकाया नहीं देते तो अफसर क्यों दें?

    सामर्थ्यवान लोग चाहे नेता हों या अफसर, नियमों के पालन में गंभीर नहीं रहते. देखा गया है कि मंत्री और सांसद अपना कार्यकाल पूरा होने या चुनाव हारने के बाद भी शासकीय आवास नहीं छोड़ते और वहां अपना कब्जा बनाए रखते हैं. नेताओं को लगता है कि राजधानी में इतना अच्छा दूसरा आवास कहां मिलेगा और वे सरकारी बंगले में ही डटे रहते हैं. ऐसी ही सामंतशाही अड़ियल प्रवृत्ति बड़े अफसरों की भी है. महाराष्ट्र के 35 रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने तबादले या सेवानिवृत्ति के बाद भी सरकारी आवास खाली नहीं किया और नोटिस के बाद भी टस से मस नहीं हुए.

    इन अधिकारियों पर ओवर स्टे को लेकर 4 करोड़ रुपए जुर्माने की रकम बकाया है. नियम यह है कि जब किसी आईपीएस अधिकारी का एक पद से दूसरे पद पर तबादला होता है तो उसे अपने उत्तराधिकारी के लिए एक तय समयसीमा के भीतर सरकारी आवास खाली करना पड़ता है. यदि वे इस मुद्दत के बाद भी आवास खाली नहीं करते तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है. देखा गया है कि ये अधिकारी न तो आवास का कब्जा छोड़ते हैं और न ही जुर्माना भरते हैं. अपनी अकड़ में शायद वे मानकर चलते हैं कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. वैसे आईपीएस अधिकारी को ट्रांसफर के बाद 3 महीने की मोहलत दी जाती है, जिससे वह अपने परिवार को शिफ्ट कर ले.

    इसके बाद भी अगले 3 महीने तक सरकार सिर्फ लाइसेंस फीस लेती है. यह समय पर्याप्त है लेकिन फिर भी अधिकारी सरकारी आवास खाली करने के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना करते हैं. सबकी अपनी-अपनी दलीलें हैं. किसी ने कहा कि उन्होंने सरकारी आवास में ओवर स्टे नहीं किया तो किसी ने कहा कि उन्होंने विभाग को जानकारी दे दी थी. एक बड़े अधिकारी का तबादला 2011 में हुआ लेकिन वे मुंबई में अलॉट किए गए सरकारी अपार्टमेंट में 2020 तक रहे. इस तरह 9 वर्षों तक उन्होंने कब्जा नहीं छोड़ा. उन पर 75 लाख से ज्यादा का जुर्माना लगाया गया है. 7 अधिकारियों पर मार्च 2021 तक प्रत्येक पर 20 लाख रुपए बकाया था.