बोफोर्स की आई याद अब राफेल में कमीशनखोरी

    राफेल करार (Rafale Deal) पर 2016 में हस्ताक्षर के बाद विमान निर्माता कंपनी डसाल्ट ने भारतीय मध्यस्थ कंपनी डेफसिस सोल्युशन्स (Defsys Solutions) को 11 लाख यूरो दिए थे. फ्रांस की भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी ने इसकी जांच की है. यह जानकारी फ्रांस की समाचार वेबसाइट ‘मीडिया पार्ट’ ने दी. डेफसिस सोल्युशन्स को राफेल विमान की 50 प्रतिकृति बनाने का ठेका दिया गया था, परंतु उसने एक भी प्रतिकृति नहीं बनाई. इस कार्य का उसे अनुभव भी नहीं था.  

    स्वीडन की एबी बोफोर्स कंपनी से हाविटजर तोपों की खरीद में कमीशनखोरी को लेकर देश की राजनीति में ऐसा भूचाल आया था कि राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार हिल गई थी. बोफोर्स घोटाले की सर्वत्र गूंज हुई थी और इस सिलसिले में हिंदुजा बंधुओं व क्वात्रोची के नाम चर्चा में आए थे. इसके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार आई थी लेकिन वर्षों तक चली जांच-पड़ताल से भी पता नहीं चल पाया कि बोफोर्स तोप (Bofors Scandal) सौदे का कमीशन किसके पास गया. हिंदुजा पर मामला टिक नहीं पाया और क्वात्रोची मलेशिया, लंदन, अर्जेंटीना भागता फिरा. सीबीआई उसे पकड़ नहीं पाई और विदेश में उसकी मौत हो गई. बोफोर्स सौदा एक अनसुलझी पहेली बनकर रह गया. जार्ज फर्नांडीज के रक्षा मंत्री रहते समय भी तहलका डॉट कॉम ने रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया था. अब फ्रांस से खरीदे गए राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में भी रिश्वत के रूप में करोड़ों रुपए के लेन-देन का खुलासा हुआ है. जिस तरह बोफोर्स सौदे में पे-ऑफ या रिश्वत की पोल स्वीडन रेडियो ने खोली थी, उसी तरह फ्रांस की एक समाचार वेबसाइट ने 60,000 करोड़ रुपए के राफेल सौदे पर सवाल उठाए हैं.

    रिपोर्ट के अनुसार इस डील में एक भारतीय मध्यस्थ को 11 लाख यूरो (लगभग 9.48 करोड़ रुपए) दलाली दी गई. कांग्रेस ने इस मामले में मोदी सरकार पर निशाना साधा है. पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि इस पूरे लेनदेन को ‘गिफ्ट टु क्लायंट’ की संज्ञा दी गई है. क्या ये छिपे हुए ट्रांजैक्शन का हिस्सा था? यह क्लायंट डील राफेल बनाने वाली कंपनी डसाल्ट के ऑडिट में दिख रही है. जब दो देशों की सरकारों के बीच रक्षा समझौता हो रहा है तो किसी बिचौलिए को कैसे इसमें शामिल किया जा सकता है? कांग्रेस ने मांग की कि रिश्वत पाने वाले का नाम बताया जाए तथा इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए ताकि पता चल सके कि डील के लिए किसको कितने रुपए दिए गए. कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि अगर यह मॉडल बनाने के पैसे थे तो इसे गिफ्ट क्यों कहा गया?