राजपक्षे के चौथे भाई भी शामिल, श्रीलंका में चल रही परिवार की सरकार

    लोकतंत्र की परिभाषा यही रही है कि ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन’ लेकिन प्रत्यक्ष रूप में लोकतंत्र में भाई-भतीजावाद पनपता देखा गया है. कुछ घराने या उनसे जुड़े लोग ही सरकार पर कब्जा जमाए रहते हैं. मंत्री की पत्नी, बेटी-बेटा व दामाद-बहू मंत्री बनते देखे गए हैं. वंशवादी राजनीति ने लोकतंत्र पर ग्रहण लगा दिया है. इसे लेकर दलील दी जाती है कि नेता के बेटे को बचपन से राजनीति की समझ रहती है और वह पारिवारिक माहौल में सब कुछ आसानी से सीख जाता है. जब डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील बन सकता है तो इसी तरह नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता? यह बात अलग है कि इससे सामान्य नेताओं का हक मारा जाता है.

    वंशवादी राजनीति लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों का हनन करती है जिसमें नेता ऊपर से लाद दिया जाता है. लोकतंत्र और राजतंत्र में फर्क ही क्या रह गया जब एक ही खानदान या कुनबा सत्ता पर कब्जा करके बैठ जाए? श्रीलंका में तो हद हो गई. वहां राजपक्षे परिवार का चौथा भाई बासिल राजपक्षे भी सरकार में शामिल हो गया. श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति, महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री, चामाल राजपक्षे कृषि मंत्री हैं. इतना काफी नहीं था, अब उनके एक और भाई बासिल राजपक्षे ने वित्तमंत्री पद की शपथ ली है. यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार में राजपक्षे परिवार के लोगों की तादाद 7 हो गई है.

    पीएम महिंदा के बड़े बेटे नमल खेल मंत्री हैं जबकि कृषि मंत्री चमाल के बेटे शीशेंद्र राज्यमंत्री हैं. लोकतंत्र का इससे बड़ा मखौल और क्या हो सकता है! अमेरिका और श्रीलंका की दोहरी नागरिकता रखने वाले बासिल राजपक्षे ने संसद का चुनाव भी नहीं लड़ा था. वह निर्वाचित सांसदों की राष्ट्रीय सूची के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से संसद में पहुंचे हैं. एक ही परिवार के 7 लोग जिनमें 4 सगे भाई हैं, सरकार चलाएं तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि सामंतशाही है. ऐसे शासनतंत्र में जनता की आवाज नहीं सुनी जाएगी, बल्कि तानाशाही बढ़ेगी.