यूपी सरकार को ताकीद जीवन का आधार ही सर्वोपरि

    सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा पर सख्त एतराज जताते हुए कहा कि जीवन का अधिकार सर्वोपरि या सबसे बड़ा है, धार्मिक भावनाएं इसके बाद में आती है. कोरोना के मद्देनजर कांवड़ यात्रा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. एक ओर जहां उत्तराखंड सरकार ने कोरोना संकट देखते हुए कांवड़ यात्रा प्रतिबंधित कर दी है, वहीं यूपी सरकार ने पुरानी परंपरा और आस्था का मुद्दा बताकर इसे छूट दी है.

    सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना महामारी के बीच कांवड़ यात्रा को अनुमति देने के उत्तरप्रदेश सरकार के फैसले पर मीडिया की खबरों का 14 जुलाई को स्वयं संज्ञान लिया था और इस मामलों पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रिया को देखते हुए यूपी सरकार के साथ-साथ केंद्र को भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का उल्लेख किया था कि कोविड-19 की रोकथाम पर थोड़ा भी समझौता नहीं किया जा सकता और कहा था कि नागरिक इस तथ्य से हैरान हैं कि यूपी सरकार ने कांवड़ यात्रा को कैसे अनुमति दी है? न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन व न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने उत्तरप्रदेश सरकार को 19 जुलाई तक यह बताने को कहा कि क्या वह राज्य में सांकेतिक कांवड़ यात्रा आयोजित करने के अपने फैसले पर फिर से विचार करेगी? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां तक धार्मिक भावनाओं का मुद्दा है, पहली नजर में उसका दृष्टिकोण है कि सभी प्रकार की भावनाएं संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन हैं.

    यूपी सरकार ने पीठ को बताया था कि उसने संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद कोरोना प्रोटोकाल के उचित प्रतिबंधों के साथ ‘सांकेतिक’ कांवड़ यात्रा आयोजित करने का फैसला किया है. केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यों को कांवड़ यात्रा की अनुमति नहीं दी जाए और टैंकरों के जरिए गंगाजल की व्यवस्था निर्दिष्ट स्थानों पर की जाए तथा शिव मंदिरों तक गंगाजल पहुंचा दिया जाए.