Supreme court

    सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल काफी अहमियत रखता है कि केंद्र सरकार पूरी वैक्सीन क्यों नहीं खरीदती तथा राज्यों और केंद्र के बीच वैक्सीन की अलग-अलग कीमतों के पीछे कौन सा तर्क है? केंद्र सरकार ने बजट में वैक्सीनेशन के लिए 35,000 करोड़ रुपए का प्रावधान कर रखा है जिससे वह जरूरतमंद राज्यों की मदद कर सकती है. इसके अलावा केंद्र पूरी वैक्सीन खरीदे तो उसे थोक में किफायती दामों में मिल सकती है. वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने 2 तरह की कीमतें रखी है.

    सीरम इंस्टीट्यूट ने शुरू में केंद्र सरकार को 150 रुपए प्रति खुराक की दर से वैक्सीन बेची. उसी वैक्सीन की वह राज्यों से दोगुनी कीमत वसूल कर रहा है जबकि राज्यों का राजस्व केंद्र की तुलना में कम है. कोविशील्ड के लिए राज्यों को 300 रुपए प्रति खुराक देने होंगे. स्वदेशी कंपनी बायोटेक ने कोवैक्सीन की एक खुराक की कीमत 400 रुपए घोषित की है. ऐसे समय तो वैक्सीन का पेटेंट स्थगित किया जाना चाहिए. भारत बायोटेक का उत्पादन एकाधिकार स्थगित कर अन्य कंपनियों को वैक्सीन बनाने की छूट दी जाए तो वैक्सीन का उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है और बड़ी तादाद में लोगों की जरूरतें पूरी हो सकती हैं. अभी हालत यह है कि 18 से 44 साल उम्र तक के लोगों को 1 मई से वैक्सीन लगाने की घोषणा तो कर दी गई लेकिन वैक्सीन ही उपलब्ध नहीं है.

    वैक्सीन की सप्लाई नीति व उत्पादन लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल सही कहा कि किस राज्य को कितनी वैक्सीन मिलेगी, ये प्राइवेट वैक्सीन निर्माता नहीं तय करेंगे. केंद्र को नेशनल इम्यूनाइजेशन मॉडल बनाना चाहिए. सुको ने चेतावनी दी कि यदि कोई सोशल मीडिया पर आक्सीजन या बेड नहीं मिलने जैसी शिकायत डालता है तो उसे दबाया नहीं जाना चाहिए. अगर किसी ने इन्हें रोका तो हम इसे अदालत की अवमानना समझेंगे. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश भी महत्वपूर्ण है कि अब होटलों, मंदिरों, चर्चों और दूसरी जगहों को खोल दिया जाए ताकि उन्हें कोविड सेंटर के रूप में तब्दील किया जा सके.