वक्त यूं बदलता है, कहां से कहां पहुंची कांग्रेस

    कहावत है- कभी नाव गाड़ी पर, तो कभी गाड़ी नाव पर! कांग्रेस की भी यही हालत है. स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से अधिकांश वर्षों तक केंद्र व राज्यों की सत्ता में रही कांग्रेस के सामने बाकी पार्टियां पानी भरती नजर आती थीं. कांग्रेस ने देश को नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी वी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री दिए. पहले कांग्रेस की अगुआई में बाकी दल जुड़ते थे. यूपीए इसी तरह बना जिसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी हैं.

    अच्छे वक्त के सभी साथी होते हैं. कांग्रेस नेतृत्व का यूपीए 2014 में केंद्र में सत्ता खो बैठा. इसके बाद से क्षेत्रीय पार्टियों का रवैया बदल गया. यद्यपि आज भी बीजेपी के बाद कांग्रेस देश की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन अब गैर बीजेपी पार्टियां कांग्रेस को तवज्जो नहीं देती. हालत यह है कि अब छोटे दल गठबंधन बनाने की प्रक्रिया में कांग्रेस को अपने साथ लेने की बात करते हैं. इस तरह कांग्रेस का मूल्य और वजन घट गया है. यह बात अलग है कि आज भी कांग्रेस की अपने दम पर पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड में सरकारें हैं तथा वह महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार में शामिल है.

    जब बीजेपी से मुकाबला करने के लिए वैकल्पिक फ्रंट की बात होती है तब या तो नेता के रूप में शरद पवार का नाम लिया जाता है या ममता बनर्जी का! हाल ही में गैर कांग्रेस पार्टियों का तीसरा मोर्चा बनाने की बात चली थी लेकिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि बीजेपी से मुकाबले के लिए किसी भी वैकल्पिक फ्रंट से कांग्रेस को बाहर नहीं रखा जा सकता. पवार ने किसी मोर्चे का विचार होने की स्थिति में सामूहिक नेतृत्व का आव्हान किया परंतु महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना ने राहुल गांधी को बिन मांगी सलाह दे डाली कि अगर बीजेपी के खिलाफ जंग जीतनी है तो उन्हें पवार के साथ मिलकर काम करना होगा. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य दिनेश गंुडूराव ने भी शिवसेना की सलाह का समर्थन करते हुए कहा कि राहुल गांधी को एनसीपी प्रमुख शरद पवार से हाथ मिला लेना चाहिए.