Photo: Instagram
Photo: Instagram

    मुंबई: अभिनेता आमिर खान (Amir Khan) चार साल बाद 60 साल के हो जाएंगे। सोशल मीडिया से वह संन्यास ले चुके हैं। मोबाइल फोन को लेकर भी उनका दावा है कि वह अपनी अगली फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की रिलीज तक इस्तेमाल नहीं करेंगे। लेकिन, वह आमिर खान ही क्या कि जब ब्रांडिंग की बॉल मिले और वह सिक्सर मारने से चूक जाएं। तो अपनी फिल्म ‘लगान’ के 20 साल पूरे होने का उन्हें रविवार के दिन एकदम से ख्याल आया और टीम को फरमान जारी हुआ कि देश दुनिया की मीडिया का दरबार लगाया जाए। ये हरकत फिल्म ‘लगान’ के साथ ही रिलीज हुई फिल्म ‘गदर एक प्रेमकथा’ की टीम की हलचल के साथ ही शुरू हुई। बॉक्स ऑफिस पर 20 साल पहले दोनों फिल्मों के बीच हुए मुकाबले का सिलसिला इनके 20 साल पूरे होने तक भी जारी दिख रहा है। फिल्म ‘लगान’ और फिल्म ‘गदर एक प्रेमकथा’ दोनों फिल्में एक ही दिन 15 जून 2001 को रिलीज हुई थीं। 

    मगर, आपको जानकर यह ताज्जुब होगा कि लगान जैसी कालजयी फिल्म का आइडिया पहली बार में आमिर को बकवास लगा था और उन्होंने फिल्म का निर्माता-कलाकार बनने से पहले चार बार इसकी स्क्रिप्ट सुनी थी। यह दिलचस्प क़िस्सा आमिर ने मीडिया के साथ बातचीत में साझा किया। आमिर ने कहा था, ‘आशुतोष (गोवारिकर) ने लगान की कहानी मुझे पहली बार दो मिनट में सुनाई थी। उसने कहा था- एक गांव है। बारिश नहीं हो रही है तो गांव वाले लगान नहीं दे पा रहे हैं। लगान खत्म करवाने के लिए वो शर्त लगाते हैं कि क्रिकेट खेलेंगे। यह आइडिया मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने कहा- यह कोई आइडिया है! 1893 में क्रिकेट खेल रहे हैं, लगान माफ़ करवाने के लिए। मेरी कुछ समझ मे नहीं आया। मैंने कहा कि तेरी दो फ़िल्में (पहला नशा और बाज़ी) नहीं चली हैं। अब ठीक-ठाक काम कर। वो थोड़ा मायूस हुआ। फिर तीन महीने ग़ायब हो गया। तीन महीने बाद उसने फिर फोन किया कि यार मेरे पास स्क्रिप्ट है, कब सुन सकता है?

    आमिर ने आगे कहा, ‘मैंने कहा- ठीक है, अगले हफ़्ते सुनते हैं। फिर मुझे शक हुआ। मैंने पूछा- यार, यह वही क्रिकेट वाली स्टोरी तो नहीं है, जो तूने सुनाई थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस कहा कि तू सुन ले। मैंने कहा- क्रिकेट वाली है तो मैं नहीं सुनूंगा। तीन घंटा बर्बाद नहीं करूंगा। इतनी बुरी कहानी है, फिर भी तू उस पर काम कर रहा है। उसने कहा कि मैंने लिख दी है। इतना टाइम लगा है, तू सुन तो ले। मुझे झुंझलाहट तो हुई, लेकिन दोस्त है, सुनना तो पड़ेगा। जब मैंने पहली बार डिटेल स्क्रिप्ट सुनी, तो मेरी हवाइयां उड़ गयीं। इतनी अच्छी स्क्रिप्ट थी। जो आप फिल्म देखते हैं, 99 पर्सेंट वही था।’

    उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने कहा- ‘आशु कहानी तो बहुत बढ़िया लिखी है तूने, लेकिन यह बहुत मुश्किल फिल्म है। यह कौन बनाएगा? मैं उस समय प्रोड्यूसर नहीं था। मैं एक्टर था। इससे पहले मेरी और आशुतोष की ‘बाज़ी’ आयी थी, जो ख़ास कामयाब नहीं हुई थी। मैंने पूछा, यह फिल्म हम कैसे बनाएंगे? प्रोड्यूसर कौन है? चूंकि हम दोनों की पिछली फिल्म नहीं चली है, इसलिए कोई भी प्रोड्यूसर हम पर भरोसा नहीं करेगा। इस फ़िल्म के लिए जैसे रिसोर्सेज़ चाहिए थे, वो नहीं मिलेंगे। मैंने उससे कहा कि तू पहले प्रोड्यूसर लेकर आ। जिस दिन तू प्रोड्यूसर ले आएगा, तब मैं करूंगा, लेकिन प्रोड्यूसर को यह मत बोलना कि आमिर ख़ान ने हां बोल दी है, क्योंकि फिर क्या होगा? वो प्रोड्यूसर आमिर की वजह से हां बोल रहा है। आशुतोष या कहानी की वजह से हां नहीं बोल रहा। इस बीच मैंने कहा कि अगर तू किसी और को लेकर बनाना चाह रहा है तो देख ले। उसने कई एक्टरों को कहानी सुनाई, लेकिन लोगों को समझ में नहीं आयी। हर छह महीने पर मैं उसको बोलता था कि यार, एक दफा और सुना। ऐसे करके मैंने तीन दफ़ा सुनी। जब भी सुनता था तो मैं सोचता था कि यह फिल्म करनी चाहिए यार, लेकिन हिम्मत नहीं होती थी। फिर एक रात मैं अकेला बैठा था।’

    ‘मैंने सोचा- अगर गुरुदत्त, विमल रॉय, के आसिफ, शांताराम, महबूब ख़ान मेरी जगह होते तो डरते क्या? अगर तू उनकी तरह बनना चाहता है, तो उनकी तरह बर्ताव भी कर भाई। उससे मुझे हिम्मत मिली। उस समय मैंने डिसाइड किया कि अगर इसमें मुझे एक्टर करना है तो प्रोड्यूस भी करना पड़ेगा। मैं किसी और प्रोड्यूसर पर ट्रस्ट नहीं कर सकता। हालांकि, मुझे प्रोड्यूसर नहीं बनना था, क्योंकि मैंने अपने पिता को देखा हुआ था प्रोड्यूस करते हुए। फिर एक आखरी दफ़ा मैंने आशु (आशुतोष गोवारिकर) को बोला कि एक चौथी दफ़ा सुना दे मुझे और उस नैरेशन में मैंने अम्मी-अब्बा जान को बुलाया। मैं अपने नैरेशन में किसी को बुलाता नहीं हूं। अकेले सुनता हूं। मैंने पहली बार अम्मी-अब्बू को बुलाया। पहली बार रीना को बुलाया, जो उस वक़्त मेरी पत्नी थीं। अम्मी-अब्बा जान, मैं, रीना, आशुतोष, झामू सुगंध.. इतने लोग थे मेरे स्टडी रूम में। नैरेशन शुरू हुआ, खत्म हुआ। मैं सबसे चेहरे देख रहा था। मैं उनके भाव देख रहा था। मैंने अम्मी-अब्बा से पूछा। उन्होंने बस एक ही बात कही कि जब कहानी अच्छी होती है तो तुम्हें कर लेनी चाहिए। उसके आगे मत सोचो। फिर मैंने रीना से पूछा। उसने कहा, मुझे नहीं पता आपको करनी चाहिए या नहीं, लेकिन मुझे बहुत अच्छी लगी। आशुतोष को पता नहीं था यह सब। उसे लगा मैं तफ़रीह में चौथी बार सुन रहा हूं। मैंने उस दिन तय किया कि मैं फिल्म प्रोड्यूस कर रहा हूं और एक्ट भी कर रहा हूं।’