आत्मनिर्भरता में पिछडता तहसील, संभावनाएं मौजूद

  • अमलीजामा पहनाने की जरूरत

सिरोंचा. जिले के दक्षिण क्षेत्र में स्थित सिरोंचा तहसील जिसे ब्रिटिश कालीन सल्तनत कहा जाता रहा है. जो अपनी ऐतिहासिक पहचान के चलते जिले मे अपनी एक अलग पहचान रखता है. मात्र बेरोजगारी, पलायन, असुविधाएं, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर संचार सेवाओं की कमी, सिंचाई सुविधाओं का अभाव आदी विरासत के रुप मे मिले हुए है. जो आज भी अभिशाप बनकर तहसिल को पिछड़ेपन की ओर धकेलते नजर आ रहा है. जबकी इस दिशा मे संभावनाओं के मौजूद होने की बात जानकारों के द्वारा समय समय कहा जाता रहा है. वही तहसिल के पडौसी राज्यों तेलंगाना व छत्तीसगढ  के सीमावर्ती जिलों मे इन क्षेत्रों मे काफी उन्नति हुई है. जिससे आसानी से देखा जा सकता है.

आज के युग मे जहां केंद्र एवं राज्य की सरकार आत्मनिर्भरता के दिशा मे अनेक तरह के योजनाएं ला रहे है. जिनके बलबूते बेहतर विकास के कारण सुदृढ अर्थव्यवस्था हासिल की जा सकती है. आज के समय मे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के दिशा मे अनेक योजनाएं संचालित किए जा रहे है. जिनमें गृह उद्योग, वनस्पति उद्योग, वन संपदा से जुड़े हुएं उद्योग, महिला समूहों के माध्यम से किए जानेवाले घरेलू उद्योग आदी तरह के प्रयोगों के बलबूते स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी दूर की जा सकती है. मात्र तहसील मे इस दिशा मे लगातार प्रयासों के अभाव मे ये महत्वपूर्ण एवं ग्रामीण अर्थवयवस्था को गती देनेवाले योजनाएं ठंडे बस्ते मे जाते नजर आ रहे है. योजनाएं शुरु भी किए जा रहे है तो वह निरंतरता के अभाव मे चार दिन की चांदनी साबित हो रहे है. जबकी तहसील का समूचा क्षेत्र भौगोलिक रुप से अपार वन संपदा, खनिज संपदा  के अलावा कृषी प्रदान इलाका है. 

विधानसभा की मान्यता मिलने के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी एक भी उद्योगग अब तक स्थापित नही किया जा सका है. जिससे खरीफ़ फसल के बाद ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी तादाद मे लोग पलायन को रोजगार का विकल्प मान कर निकल पड़ते है. तहसील के बड़े भूक्षेत्र पर कृषि की जाती है. जिसमे धान, कपास, मिर्ची बड़े पैमाने पर फसल ली जाती है. मगर स्थानीय किसानों को आज तक इन्हे संरक्षित रखने हेतू स्टोरेज सेंटर्स नसीब नही हो पाया है. कपास एवं मिर्ची को बेचने लंबी दूरी तय कर अधिकृत केन्द्रो पर पहुंचना होता है.