‘नक्सलगड’ में निकल रहा विकास का सुरज

  • विभीन्न पर्यटल स्थलों से कमलापूर को मिली गति
  • जनप्रतिनिधी के साथ प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता

गडचिरोली. एक समय में केवल नक्सलियों के हिंसक गतिविधियों के कारण कुप्रसिद्ध होनेवाले जिले के दक्षिण छोर पर बसे अतिदुर्गम, आदिवासी बहुल कमलापूर धिरे धिरे विकासपथ पर बढ रहा है. स्थानीय विभीन्न पर्यटल स्थलों के कारण जिले के ही नहीं बल्की दुसरे राज्य के पर्यटकों को भी यह क्षेत्र लुभा रहा है. जिससे करीब एक दशक पूर्व नक्सलियों का गड के रूप में कुप्रसिद्ध होनेवाले कमलापूर में विकास का सुरज उगता दिखाई दे रहा है. इस क्षेत्र के सर्वांगिन विकास के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ सरकार व प्रशासन द्वारा विशेष ध्यान देने पर अल्प समय में ही यह कमलापूर यह अपनी अलग पहचान बनाने में कोई कसर बाकी रहीं रखेगा, ऐसी बात कहीं जा रही है. 

गडचिरोली जिले के अहेरी उपविभाग अंतर्गत आनेवाले अहेरी तहसील का कमलापूर परिसर नक्सलियों के हिंसक गतिविधियों के कारण हमेशा चर्चा में रहा है. नक्सलियों के यहां निरंतर हलचलों के कारण कमलापूर यह नक्सलियों का के गड के रूप में करीब 1 दशक पूर्व पहचाना जाता था. जिससे सरकार व प्रशासन की दृष्टि से कमलापूर परिसर यह केवल नक्सलियों का केंद्र कहकर इसे छोड दिया था. मात्र जिला पुलिस दल के निरंतर नक्सल विरोधी अभियान के चलते यहां से नक्सली गतिविधियां बंद हुई. जिससे उक्त आदिवासी क्षेत्र होनेवाले कमलापूर ने अपनी असली पहचान प्राप्त करने के लए तत्पर हुआ. वनसंपदा से संपन्न व प्रकृति के गोद में होनेवाले कमलापूर में पर्यटन की दृष्टि से अनेक केंद्र पर्यटकों को आकर्षित कर रहे है. जिसेस यह केंद्र ही सहीं मायने में कमलापूर के विकास में चार चांद लगा सकते है. 

कमलापूर ग्रामपंचायत अंतर्गत कमलापूर, आसा, नैनगुड्डम, चिंतलगुडम, कोडसेलगुड्ड इन 5 गांवों का समावेश है. इन गांवों की करीब 8 से 10 हजार जनसंख्या है. उक्त क्षेत्र आदिवासी बहुल के रूप में पहचाना जाता है. यहां के पर्यटलस्थल का विकास होने पर इस परिसर के ग्रामीणों को रोजगार का नया दालन खुलेगा. जिससे सथानीय जनप्रतिनिधियों के साथ सरकार व प्रशासन पर्यटन विकास की दृष्टि से कदम उठाना आवश्यक है. 

इन पर्यटलस्थलों के लिए कमलापूर प्रसिद्ध 

प्रकृति के गोद में बसे कमलापूर में पर्यटन की दृष्टि से अनेक स्थल है. इसमें खासकर राष्ट्रसंत द्वारा स्थापीत स्कूल , वन विभाग का सरकारी हाथी कैम्प, धबधबा, सफाई कामगार के रूप में पहचान होनेवाले माफ फिलहाल विलुप्त होने के कगार पर होनेवाले गिद्ध, दुर्लभ रानगवा होनेवाले कोलामार्का अभयारण्य यह महत्वपूर्ण पर्यटनस्थल जिले के ही नहीं बल्की दुसरे राज्यों के भी पर्यटकों को आकर्षित करते है. इन स्थलों के कारण कमलापूर प्रसिद्ध हो रहा है. भविष्य में इन पर्यटलस्थलों के कारण कमालापूर में विकास को गतिम मिलने को अधिक मौका है. 

राष्ट्रसंत के पडे चरणकमल

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज सह समुचे महाराष्ट्र में परिचित संत है. इन संत को भी कमलापूर की भूमि ने आकर्षित किया था. जिससे जिले में राष्टसंत के चरणकमलों का स्पर्श हुआ. इनके नेतृत्व में कमलापूर में श्रमदान से 1958 में निर्माण की गई गुरूदेव आश्रमस्कूल प्रकृति के गोद में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के पदस्पर्शो की गवाहीं दे रहे है. तुकडोजी महाराज ने उस समय यहां स्कूल निर्माण नहीं की होती तो कमलापूर परिसर के अनेक आदिवासी, गैरआदिवासी आज भी अज्ञानी व अशिक्षित रहा होता. इस स्कूल के अनेक विद्यार्थी आज अच्छे पदों पर कार्यरत होने से इस परिसर के विद्यार्थियों को यह आश्रमस्कूल शिक्षा का मंदिर बनी है.