लकडियों पर निर्भर ग्रामीण जीवन, विपुल वनसंपदा पर वनराज का खौफ

    • गैस के दर बढने से लकडियां लाने पर विवश ग्रामीण

    गडचिरोली. विपुल वनसंपदा के लिए गडचिरोली जिला जाना जाता है. जिले का ग्रामीण क्षेत्र वनांचल में बसा है. जिससे ग्रामीण अंचल में आसानी से लकडियां उपलब्ध हो जाती है. जिसके चलते ग्रामीणों का भोजन चुल्हों पर ही पकता है. किंतू सरकार के उज्ज्वला योजना ने ग्रामीणों के जीवनशैली में व्यापक परिवर्तन ला दिया था. उक्त योजना के तहत घर घर में गैस पहुंच गया था.

    जिससे ग्रामीण अंचल में चुल्हों के बजाएं गैस सिलेंडर पर भोजन पकने लगा था, किंतू विगत दिनों में गैस दरवृद्धी से ग्रामीणों के रसोई में फिर से चुल्हे जलने लगे है. लगभग जिले के सभी गांवों में अब ग्रामीणों का जीवन लकडियों पर ही निर्भर होने की स्थिती नजर आ रही है. वहीं उज्ज्वला योजना अंतर्गत नि:शुल्क मिले सिलेंडर शोपिस बनकर ग्रामीणों के घर की शोभा बढाने का चित्र सर्वत्र दिखाई दे रहा है. 

    जिले में विपुल वनसंपदा है, जिसके चलते ग्रामीणों को लकडियां आसानी से उपलब्ध हो जाती है. किंतू विगत कुछ दिनों से वनराज का खौफ है. वनराज ने मवेशियों के साथ अनेक लोगों को मौत के घाट उतार दिया है. ऐसे में ग्रामीण वनों में जाने से कतरा रहे है. जिससे महंगा गैस खरीदना ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है. वहीं जंगल में जाए तो वनराज का निवाला बनने का खतरा है.

    इसके बावजूद ग्रामीण पेट की आग बुझाने हेतु चुल्हे में आग जलाना आवश्यक है, इसलिए विवशतावश जान जोखीम में डालकर ग्रामीण जंगलों में जाकर लकडियां चुनकर ला रहे है. जबतक गैस के दाम कम नहीं होंगे तबतक उज्ज्वला योजना अंतर्गत मिले गैस सिलेंडर केवल ग्रामीणों के आवासों की शोभा बढाते रहेंगे, और ग्रामीणों का जिवन चुल्हों पर ही चलता रहेगा, ऐसी बात कहीं जा रही है. 

    शहरी अंचल में भी जलते है चुल्हे   

    राज्य के अंतिम छोर पर बसा गडचिरोली जिला यह एक अविसकसीत जिला है. जिससे जिले में गरीब वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है. ग्रामीण अंचल के साथ ही जिले के शहरी अंचल में झोपडपट्टी व गरीब तबके के क्षेत्र होनेवाले नागरिकों के घरों में भी चुल्हे जलते है. उज्वला योजना ने उन्हे गैस तो दिया है, महंगाई ने गरीबों का गैस सिलेंडर भरना मुश्किल कर दिया है. ऐसे गरीब परिवार चुल्हे पर ही 2 वक्त का खाना पकाते है. ऐसे में यह लोग भी जंगलों पर से लाए गए लकडियों पर निर्भर रहते है. 

    डिपो से नहीं मिलती लकडियां  

    लोगों को जलाऊ लकडियों की आवश्यकता के मद्देनजर वनविभाग द्वारा गडचिरोली शहर समेत कुछ जगह पर लकडा डिपो निर्माण किया है. खासकर शहरी क्षेत्र के लोग लकडा डिपो से लकडियां खरीदते है. किंतू विगत कुछ वर्षो से इस लकडा डिपों में अंतिम संस्कार के कार्यक्रम छोड अन्य किसी भी कार्य के लिए लकडियां नहीं दी जा रही है. जिसके चलते डिपो से भी लकडियां बंद होने से ग्रामीण वनों की लकडियों पर निर्भर रहते है. 

    उधर वनराज, इधर वनकर्मी  

    विगत कुछ दिनों से जिले के जंगलों में वनराज का खौफ निर्माण हुआ है. जिससे लोग जंगल में जाने से कतराते है. वहीं मजबुरन अनेक नागरिक अपनी जान जोखिम में डालकर वनों में लकडियां लाने हेतु जाते है. जंगलों में वनराज का खौफ तो रहता है, वहीं जंगल परिसर में सडक मार्ग से गश्त कर रहे वनकर्मीयों द्वारा कार्रवाई का भय भी लोगों को सताता है. बताया जाता है कि, जंगलों से सुखी लकडियां लाने पर वनकर्मी अधिकत्तर कार्रवाई नहीं करते है.

    मात्र सुखी लकडियां न मिलने पर लकडियों को तोडकर ही लाना पडता है. ऐसे में उधर वनराज व इधर वनकर्मी का खौफ सताता है. वहीं बता दे कि, शहरी अंचल से सटे अनेक गांवों में कुछ लकडहरे भी रहते है. जो सुबह के दौरान शहर में लकडियां बेचकर अपने परिवार का पेट पालते है. इन लकडहरों को भी जंगल में हिस्त्र पशुओं का तो रास्तों पर वनकर्मीयों का भय लगा रहता है. 

    तुअर की लकडियों की चोरी

    जिले में अनेक जगह तुअर फसलों का उत्पादन लिया जाता है, इन दिनों तुअर की फसलें निकल गई है. अनेक किसानों ने तुअर फसलों की लकडियां खेतों में जमा कर रही है. विगत कुछ दिनों से ग्रामीण अंचल में खेतों से तुअर के लकडियों की चोरी होने की घटनाएं सामने आ रही है. बताया जाता है कि, जंगलों में बाघों की दहशत होने से ग्रामीण जंगलों में जाने से कतरा रहे है. ऐसे में लोग खेतों से तुअर के फसलों की लकडियां चुराकर अपने घरों के चुल्हे जला रहे है. पेट की आग लोगों को क्या क्या करने पर विवश करती है, यह इसका एक उदाहरण होने की बात कहीं जा रही है.