ताडी पेय के सीजन को शुरूआत, स्थानीय आदिवासियों को रोजगार उपलब्ध

गडचिरोली. सिरोंचा तहसील के सभी गांवों में ताडी पेय के सीजन को शुरूआत हुई है. स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होनेवाले ताडी पेय बिक्री से स्थानीय आदिवासी व कलार समाज के नागरिकों को बडे मात्रा में रोजगार उपलब्घ हो रहा है.

ताडी व गोरखा वृक्ष दुर्लभ समझे जाते है. मात्र सिरोंचा तहसील के झिंगानूर, रेगुंठा, परसेवाडा, पातागुडम, अंकिसा, नगरम आदि परिसर के गांवों में इनके पेड बडी तादाद में पाए जाते है. फिलहाल सर्दी के मौसम को शुरूआत हुई है. इसके साथ ही ताडी पेय भी उपलब्ध हो रहा है. अब से आगामी 4 से 5 माह तक यह पेय इस परिसर में बडी मात्रा में मिलनेवाला है. जिले के अनेक क्षेत्रों में ताडी व सिंधी यह पेय उपलब्ध होते है. मात्र इस परिसर में ताडी के पेड अधिक मात्रा में होने से यह पेय का प्रमाण अधिक मात्रा में है. ताडी पेड से उतारने के बाद कुछ वर्षो में यह पेड पूर्णत सुख जाता है. इसके पश्चात यह पेड तोड जाते है. इसका उपयोग घर परिसर में तथा खेतों के संरक्षण के लिए किया जाता है. तेलगू भाषिक लोग त्यौहारों में ताडी पेय को महत्वपूर्ण स्थान देते है. 

आहार में करते है, उपयोग 

पूर्व के समय में घर में अनाज की किल्लत निर्माण होने पर गोरगा वृक्ष के गाभा से आटा तैयार कर उसके माध्यम से भूख मिटाते थे. इन पेड के अंदर का गाभा निकालकर उसका आटा बनाया जाता था. इस आटे से बनाई गए ‘आंबील’ इस पदार्थ का दैनदिन उपयोग आहार में किया जाता था. इस पेडों के पत्तों का उपयोग आज भी झोपडे तैयार करने के लि किए जाते है. पेड के तने के अंदर से प्राप्त सफेद वस्तूओं के छोटे छोटे तुकडे कर उसे धुप में सुखाकर उसे बारी कर संग्रहीत कर रखा जाता था. गोरगा पेड से खाद्यपदार्थ प्राप्त करने का यह प्रकार आज भी ग्रामीण क्षेत्र में किया जाता है. स्थानीय आदिवासी समाज बांधव गोरगा के पेड को कल्पवृक्ष के भांती स्थान दिया जाता है.