समय के आगोश में गुम हुई डाकिये की आवाज

  • डाकसेवा लुप्त होने के कगार पर

गडचिरोली. आज के कम्प्यूटर युग में खाकी गणवेष के साथ साइकिल  पर आनेवाले, दरवाजे पर आकर डाकिया आया की पुकार लगानेवाले डाकिए की आवाज अब दुर्लभ होती जा रही है। बदलते युग में डाकिए का इंतजार करने का समय पुराने दिनों की बात बन गई है। 

पूर्व के समय में डाकिए की आवाज आने पर छोटे-बडे सभी दौडे आते थे। डाकिए का सन्मान होता था। पत्र हाथ में आते ही घर के सभी लोग खुशी से झुम उठते थे। मात्र अब मोबाइल, वीडियो कॉलिंग, फेसबुक, वाट्सएप, ई मेल आदि माध्यम से तत्काल वार्तालाप हो रहा है। उस समय डाकिए के हाथ में कोई टेलिग्राम दिखाई पडने पर मन में तूफान उठता था। जिस घर में डाकिया पत्र लेकर पहुंचता था, वहां पडोसी भी जमा होते थे। पत्र में खुशी का हो गम का समचार रहे। सभी पडोसी अपना सांत्वना का साथ हमेशा रखते थे। एक समय में डाकिए को ग्रामीण क्षेत्र में देवदूत समझा जाता था। अशिक्षित लोगों को पत्र पढकर बताना, मनीआर्डर के रुपए समय पर पहुंचाना यह डाकिए का कार्य है। मात्र अब मनीऑर्डर करीबन बंद होने के कगार पर है। 

ग्रामीण क्षेत्र में करीबन प्रत्येक व्यक्ति के जेब में एटीएम कार्ड है। हाथ में दुपहिया। पल भर में एटीएम पर जाकर पैसे निकाले जाते है। किंतु मनीआर्डर लानेवाले डाकिए को देखकर जो खुशी होती थी, वह अब एटीएम के कारण नहीं होती है। परिवर्तन यह प्रकृति का नियम है. जिससे व्यापक उपयोगी होनेवाली सेवा अब अंतिम घडियां गिन रही है। इसकी जगह अब मोबाइल, फैक्स, ई मेल आदि ने ली है। ऐसे में वर्तमान स्थिति में विदेश तथा कोसो दूर होनेवाले रिश्तेदार, मित्रपरिवार लैपटाप, कम्प्यूटर, मोबाइल पर ऑनलाईन चैटींग, वीडियो कॉल कर सकते है। जिससे वर्तमान युग में डाकिएं की आवाज गुम हो गई है।