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  • अतिवृष्टि व बाढ़ का तांडव

सालेकसा. पिछले 6 महीने से कोरोना की मार झेल रहे अन्नदाता किसानों ने वर्षा ऋतु के प्रारंभ होते ही जून के दूसरे सप्ताह में बड़ी उम्मीदों के साथ धान की बुआई की, ताकि कोरोना के कारण हाथ गए रोजगार को किसी तहत फसल का उत्पादन कर पूरा किया जा सके. लेकिन शुरुआत में ही प्रकृति की मार शुरू हो गई.

फसलों का हुआ नुकसान

समय पर बारिश नहीं होने से धान की बुआई में विलंब हो गया. कृषि विभाग ने परिस्थिति को देखकर आधी फसल होने का अनुमान व्यक्त कर दिया था, इसमें भी जिन किसानों के पास सिंचाई के साधन उपलब्ध है  उन्हें धान की बुआई करने में परेशानी नहीं हुई. जबकि कुछ ऐसे किसान जो दूसरों पर आश्रित व शुरुआती बारिश पर निर्भर थे ऐसे किसानों को हर कदम पर संकट का सामना करना पड़ता है. इन सब हालातों से निपटते हुए आखिरकार अगस्त में रोपाई कार्य निपटा दिए गए. इसके बाद अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह  में अतिवृष्टि व बाढ़ का तांडव मच गया. नदी नालों व तालाबों से लगी फसल बाढ़ से चौपट हो गई. 

अब तक नहीं मिला मुआवजा

इस घटना के बाद शासन के अधिकारियों ने नुकसानग्रस्त फसलों का पंचनामा किया इसका मुआवजा अब तक किसानों को नहीं मिला है. इस अतिवृष्टि के बाद जैसे तैसे खड़ी हुई फसलों पर कीट पंतगों, पोंगा, माउ व अगरबत्ती जैसी बीमारियों ने खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पंहुचाया है. इस त्रासदी से निपटने के लिए किसानों को कर्ज लेकर दवाईयों का छिड़काव करना पड़ा है. अब भी छिड़काव शुरू करना पड़ रहा है. इसी में हल्की प्रजाति वाले धान की कटाई शुरू कर दी गई है लेकिन फिर लौटती बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. खेतों में काटकर रखी धान की फसल पानी में भीग गई. किसान प्रकृति की मार से  पूरी तरह टूट सा गया. शासन को प्राकृतिक आपदा को लेकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है  जिससे किसानों को राहत मिल सके.