Farmers protest

नयी दिल्ली: कृषि कानूनों (Agriculture Bill) के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसान नेताओं (Farmer Organizations) ने बृहस्पतिवार को कहा कि वे सरकार के साथ नौवें दौर की वार्ता में भाग लेंगे, लेकिन उन्हें इस बातचीत से ज्यादा उम्मीद नहीं है, क्योंकि वे विवादित कानूनों को वापस लिए जाने से कम पर नहीं मानेंगे। चूंकि, कृषि कानूनों के मुद्दे पर गतिरोध को समाप्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त पैनल की पहली बैठक 19 जनवरी को होने की संभावना है, ऐसे में शुक्रवार को केन्द्र सरकार (Central Government) और किसान संघों (Farmer Organization) के बीच इस मुद्दे पर यह अंतिम बैठक हो सकती है।

भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्राहां) के नेता जोगिंदर सिंह उग्राहां ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘हम सरकार के साथ कल बातचीत करेंगे। हमें शुक्रवार की बैठक से ज्यादा उम्मीद नहीं है, क्योंकि सरकार उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित पैनल का हवाला देगी। सरकार की हमारी समस्या सुलझाने की कोई अच्छी मंशा नहीं है।”

सिंह ने कहा कि किसान संघों को कोई समिति नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाए और हमारे फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी दी जाए।” एक अन्य किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने कहा कि सरकार को पता है कि अदालत कानूनों को रद्द नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार को 28 नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ बंद करना चाहिए।

कोहाड़ ने कहा कि समिति का गठन समाधान नहीं है, नए कानूनों को संसद ने बनाया है और अदालत इन्हें वापस नहीं ले सकती है। केन्द्र सरकार और किसान नेताओं के बीच पहले हो चुकी आठ दौर की बातचीत में कोई सफलता नहीं मिली है। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बृहस्पतिवार को दिन में कहा था कि सरकार को आशा है कि शुक्रवार को होने वाली बैठक का कुछ अच्छा परिणाम निकलेगा।

पीटीआई-भाषा के साथ साक्षात्कार में उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त पैनल के सदस्य अनिल घनवट ने कहा कि किसानों के साथ अगर प्रदर्शन स्थल पर जाकर बात करने का अवसर आया तो समिति इसे ‘‘अहं या प्रतिष्ठा का मुद्दा” नहीं बनाएगी। न्यायालय द्वारा समिति के गठन के बावजूद केन्द्र सरकार द्वारा प्रदर्शन कर रहे किसानों के साथ समानांतर बातचीत करने के बारे में सवाल पर घनवट ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि सरकार के साथ उनकी यह अंतिम बैठक होगी। वे कहेंगे कि इसके बाद आपको (किसानों) समिति के साथ बातचीत करनी होगी, जोकि अपनी रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को सौंपेगी।”

समिति के कामकाज में भाग लेने की किसान संघों की अनिच्छा के संबंध में घनवट ने कहा, ‘‘हम उनके पास जाएंगे। हम उनके भाई-बंधु हैं। हमने अतीत में भी एकसाथ काम किया है। हम उनके पास जाएंगे, उनके साथ बैठेंगे और मुद्दे पर चर्चा करेंगे। इसमें कोई समस्या नहीं है।”

किसान संगठनों का कहना है कि वे सरकार के साथ निर्धारित वार्ता में हिस्सा लेने को तैयार हैं, लेकिन उन्होंने न्यायालय द्वारा नियुक्त पैनल के समक्ष उपस्थित होने से इंकार किया है और उसके सदस्यों पर भी सवाल उठाया है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान ने बृहस्पतिवार को कहा कि वह न्यायालय द्वारा नियुक्त चार सदस्यीय समिति से खुद को अलग कर रहे हैं।

किसान संगठनों और विपक्ष ने न्यायालय द्वारा गठित पैनल को ‘सरकार समर्थक’ बताते हुए कहा था कि उसके सभी सदस्य पहले ही कृषि कानूनों का खुलकर समर्थन कर चुके हैं। हजारों की संख्या में पंजाब, हरियाणा एवं अन्य राज्यों के किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर पिछले लगभग 50 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। वे तीनों कानूनों को वापस लेने और अपने फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं।